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आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक

दामे-हर-मौज में हैं हल्क़--सदकामे-निहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होने तक

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून--जिगर होने तक

हम ने माना के तग़ाफ़ुल करोगे लेकिन
ख़ाक हो जायेंगे हम तुम को ख़बर होने तक

पर्तौ--खुर से है शबनम को फ़ना की तालीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होने तक

यक नज़र बेश नहीं फ़ुर्सत--हस्ती ग़ाफ़िल
गर्मी--बज़्म है इक रक़्स--शरर होने तक

ग़मे-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़ मर्ग इलाज
शम्म' हर रंग में जलती है सहर होने तक

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  1. मिर्ज़ा साहब को तो रोज़ ही किसी न किसी संदर्भ में याद करते ही हैं। यहां उन्हें देख कर नमन भी किया॥

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  2. बहुत लाजवाब गज़ल से रूबरि करवाया है। अगर इकठी कुछ गज़ल या उनकी गज़ल की पुस्तक डाउन लोड करवा सकें तो कृ्पा होगी। धन्यवाद्

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  3. क्या कहूं और कहने को क्या रह गया...शुक्रिया.

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