चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूथा जाऊँ
चाह नहीं प्रेमी माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ
चाह नहीं सम्राटों के
शव पर हे हरि डाला जाऊँ
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूँ भाग्य पर इतराऊँ
मुझे तोड़ लेना बनमाली
उस पथ पर तुम देना फेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जाएँ वीर अनेक







2 टिप्पणियाँ:
बहुत बहुत धन्यवाद भाई इस कविता को यहां प्रकाशित करने के लिए. कवि नें यह कविता छत्तीसगढ के बिलासपुर जेल में लिखी थी.
aaj se pachas sal pahile kaksha panch me ye kavita padee thee aur abhee tak yad hai par rachanakar ka naam bhool gaye the .bahut bahut dhanyvad is anmol vicharo kee rachana ko padane ka avsar dene ka .
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