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बीती विभावरी जाग री!
अम्बर पनघट में डुबो रही
तारा घट ऊषा नागरी।


खग कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर ला‌ई
मधु मुकुल नवल रस गागरी।


अधरों में राग अमंद पिये,
अलकों में मलयज बंद किये
तू अब तक सो‌ई है आली
आँखों में भरे विहाग री।

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  1. बहुत महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं आप ! आभार ।

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  2. बन्धुवर,

    क्या कहीं से बाबू श्यामसुन्दर दास जी की छबि मिल सकती है? हिन्दी विकि पर उनके बारे में पृष्थ है वहाँ लगाना है।

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  3. यह कविता तो दसवीं कक्षा में पढ़ी थी । फिर से याद आ गयी । आभार

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