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महात्मा के शब्द

यह बात सर्वविदित है कि सिनेमा मनोरंजन का सस्ता और अच्छा साधन है . इसमें समाज सुधारक दृश्यों को देखर व्यक्ति अपने जीवन को ठीक कर पाटा है . दध्यंग ऋषि अश्वनी  कुमारों के गुरु अगले जन्म में दधिची नामक ऋषि के रूप में प्रसिध्य हुए .इन्ही आचार्य के पास एक बार देवराज इंद्र ब्रह्मविद्या का उपदेश सुनने गए . इससे दध्यंग ऋषि धर्म संकट में पड़ गए . वे जानते थे कि इंद्र अभिमानी स्वभाव का है . जिस कारण वह इस विद्या का अधिकारी नहीं था . किन्तु इंद्र ने पहले ही दध्यंग ऋषि से वचन ले लिया था . जिस वजह से दध्यंग ऋषि इंद्रा को ब्रह्मज्ञान देने पर विवश थे .
एक स्त्री का एकलौता होनहार किशोर -अवास्थासंपन्न पुत्र अचानक मर गया . इससे स्त्री को बड़ा शोक हुआ . पुत्र के मृतक हो जाने पर भी वह मोहवश वह समझती थी कि संभवत किसी जानकार के उपचार (औषधि) करने से अभी पुत्र जीवित हो जाएगा . अतः उसने इस आशा से पुत्र के शव की अंत्येष्टि नहीं की . वह रोती - बिलखती ही थी . इतने में मार्ग से जाते हुए एक महात्मा हो देखा . स्त्री जाकर महात्मा के चरणों में पड़ गयी और अपनी दुखद - कहानी कह सुनाई .

यह सच है कि बिजली के बल्ब के अविश्व्कार से पहले लोग अपने घरों में उजाला करने के लिए मिटटी के तेल या सरसों के तेल के दीपक जलाते थे।  ऐसा कोई लैंप नहीं था जो किसी चीज़ को जलने के लिए उपयुक्त हो
महात्मा ने सोचा कि यदि इसे उपदेश दिया जाय , तो उसका प्रभाव इस पर नहीं पड़ेगा . अतः इसे मोह -नींद से जाग्रत करने के लिए ठोस उपाय निकलना है . कुछ क्षण विचार करके महात्मा ने कहा - 'इस लड़के का उपचार मैं कर सकता हूँ . परन्तु तुम इतना करो की जिस घर के कुटुंब में से कभी कोई न मरा हो , उसके घर से एक तोला राई के दाने ले आओ .''


मोह में पागल भोली - भाली नारी , महात्मा के शब्द का भाव न समझ सकी तथा राई के दाने खोजने चली . कई गाँव - नगरों में वह भटकती रही . जिसके घर में जाती और कहती कि आपके घर में यदि कभी कोई प्राणी न मरा हो , तो एक तोला राई के दाने दे दो .'' इतना सुनकर घर वाले कुटुम्बी अपने स्वजनों के मृत्यु सम्बन्धी दुखों का स्मरण कर रोने लगते . कोई कहता - 'हमारा लड़का मर गया . कोई कहता पिता ,भाई या स्त्री मर गयी है , इत्यादि . इस प्रकार मृत्यु की कथा जब उसने सब घरों में सुनी , तब उसके चित्त में काफी संतोष आया . और उसने महात्मा से आकर निवेदन किया - प्रभो ! आपकी युक्ति से मेरी मोह - निंद्रा भंग हो गयी . जब सभी प्राणी पर मृत्यु मंडरा रही है , तो मेरा पुत्र ही किस खेत की मूली था .


इस प्रकार कहकर और महात्मा से उपदेश पाकर उसे वैराग्य हो गया और तब से वह अखंड ब्रम्हचर्य का पालन करके भजन -भक्ति में जीवन बिताने लगी .

कोई विद्या को अंह ले , मद्पी सम बेहोश !

निज सैम गनत न काहुको , बोलत बचन सरोष !!

कोई तो पढ़ लिख कर अहंकार लेकर , मद्द्पी के समान अचेत है . अपने समान किसी को नहीं समझता , जो कुछ बोलता है ,अभिमानपूर्ण या उद्देग्पूर्ण !
मेरा गांव बाहत प्यारा है।  गांव में घुसते से प्राचीन शिवालय है , जहाँ बड़े बड़े नीम के पेड़ हैं।  जब मैं अपने गावं जाता हूँ तो वहां पक्ष्मी कोने में बड़े बड़े बरगद के पेड़ दिखाई देते हैं।  

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