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बच्चों के सर्वांगीण विकास

बाल दिवस का अर्थ होता है वह दिन जिसमें बच्चों के सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखकर आयोजित किये जाते हैं .इस दिन बालों के लिए देश में अनेक कार्यक्रम बनाये जाते हैं . आज के बच्चे कल के नागरिक हैं .ये बच्चे ही आने वाले भारत की वास्तविक सम्प्पति हैं . नाटक में संवाद योजना इस प्रकार की जानी चाहिए कि वे नाटक के पात्रों के चरित्र पर भली - भाँती प्रकाश डाल सकें . नाटक में चरित्रों पर प्रत्यक्ष  और अप्रत्क्ष दो रूपों से प्रकाश डाला जाता है . आषाढ़ का एक दिन नाटक में ये दोनों रूपों दिखाई पड़ते हैं . जब दो पात्रों की बातचीत से सीधे उनका चरित्र प्रकाशित हो वहां प्रत्यक्ष और जब दो पात्रों की बातचीत से तीसरे पात्र  का चरित्र प्रकाशित होता है ,वहां अप्रत्यक्ष चरित्र प्रकाशन विधि होती है . आषाढ़ का एक दिन में नाटककार ने चरित्र प्रकाशित करने की इन दोनों विधियों को अपनाया है . बच्चे किसी भी देश के बादशाह की  अनुमति लेकर बीरबल बेगम साहिबा के पास पहुँचे . बीरबल को आते देख कर बेगम बड़ी प्रसन्न हुई और बड़ी आवभगत की . कुशल क्षेम  के पश्चात बेगम साहिबा ने बीरबल से पधारने के प्रयोजन पूछा . बीरबल ने हंसी दबाते हुए कहा - बादशाह सलामत शाही महाभारत बनवा रहे है . वह करीब करीब बन कर तैयार हो गया है , मैं अपने साथ में लेता भी आया ,कुछ बात उसमे रह गयी है ,जिसके बारे में आपसे सलाह लेना बाकी है . कृपया सब खुलासा बताती जाइए . यह तो आप जानती ही हैं कि महाभारत में पांडवों की ओर  से द्रौपदी थी और अपने इस शाही महाभारत की नायिका आप ही हैं , परन्तु जैसे हिन्दुओं के प्राचीन महाभारत में नायक पाँच  पांडव थे तो आपके पाँच पतियों में बादशाह सलामत के अलावा चार और कौन - कौन है ? दूसरी बात यह  है कि भरी सभा में दुशासन ने द्रौपदी का चीर हरण किया था और पांडव इस घोर अपमान को सहते रहे उसी प्रकार किस समय और किस काफ़िर ने भरी सभा में आपकी इज्ज़त ख़राब की थी और जिसे बादशाह सलामत चुपचाप सहन करते रहे हों . 

बीरबल की बात पूरी होने से पहले ही बेगम का पारा सातवें आसमान पर पहुँच चूका था , वह गुस्से में लाल थी , फ़ौरन दासियों को हुक्म किया कि अभी मेरे सामने इस पन्नों को मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दो .हुक्म की देर थी , बनावती महाभारत दो मिनट में जल कर राख बन गयी . बीरबल भी उल्टे पैर लौट आये और बनावटी दुःख प्रगट करते हुए बादशाह से सारा हाल कहा . सुनकर बादशाह बड़े शरमाये और जीवन भर फिर कभी शाही महाभारत बनवाने का नाम न लिया . 


कागज़ का बण्डल - 

बम्बई शहर में एक सज्जन रहते थे . प्रातःकाल सड़क से होकर  भ्रमण करने जा रहे थे . आगे बढ़ने पर उन्हें एक कागज़ का बण्डल मिला . वे उसको उठाकर घर ले गए . खोलने पर पच्चीस हज़ार रुपये के नोट मिले . पहले तो उन्हें बड़ा हर्ष हुआ कि जीवन भर की दरिद्रता गयी . परन्तु कुछ समय के पश्चात उनका विवेक बल उन्हें कोचने लगा - 'अरे मूर्ख ! जिस पैसे से तू अपना कुशल मानता है ,क्या तेरे पसीने की कमाई है ? जिसके इतने रुपये खो गए होंगे , उसकी अंतरात्मा कैसी होगी ? क्या धन स्थायी है ? अभी तुम्हारी मृत्यु आ जा , तो ये धन किस काम का ? लोक - परलोक नाशक दूसरे का धन विष से भी विष होता है .''भला  किस  को  माल  से पसंदगी  न  होगी  , लेकिन  में  मालखाने  की  बात  कर  रहा हूं  जो  थाने  के  कुछ अंदर ,   तो कुछ बाहर यथा दुर्घटना के बाद लंबित मामलों  की थाने में रखी  कार और  अन्य मोटर साइकिलें  ( मेटेरियल एवीडेंस ) इस  माल   को  बजाए सडाने  के ( चूकि मामलों  के  विधिक रूप  से निपटारे तक ) इस सामग्री  को रखना ही है  तब  क्यूं  न  कोई  न्य वैज्ञानिकव अन्य  देशों  में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया का अनुसरण कर लिया  जाए  कि  इस  की  वीडियो फूटेज  को  उसी  समय  गवाहान  के सामने  सील  करके  या  उस  फूटेज  को  ही  न्यायालय में रिकर्ड पर लेकर , सामान को  उसके स्वामी को ( एफ आई आर  फाइल के दस दिन में ) सुपुर्द  कर  दिया जाए .

निदान स्वरुप वह सज्जन अपने निश्चित विचार पर आ गया . सौभाग्य से उस रुपये के बण्डल पर रुपये वाले के नाम - पता लिखे थे . अतः सज्जन ने जाकर रुपये वाले को रुपये दे दिए . रुपये वाले ने उस सज्जन को पारितोषिक रूप में कुछ रुपये देने चाहे . परन्तु उसने नहीं लिया और यह कहकर चल दिया कि ' मैं अपने कर्त्तव्य एवं मानव धर्म को बेचने नहीं आया हूँ .'' धन्य उसकी निर्लोभता !

इस प्रकार पड़ा हुआ धन पाकर , पहले उसके स्वामी को खोजकर उसी को देना चाहिए . यदि स्वामी का पता न लगे , तो सरकार के कोष में देना चाहिए या कोई सार्वजनिक सेवा , धर्म कार्य में लगा देना चाहिए . 

सबकी समझ - 

इस संसार में कोई किसी का नहीं है . सबके कर्म तथा फल - भोग पृथक - पृथक हैं . स्त्री - पुत्र मित्र बंधू कोई किसी के कर्म फल भोग में साझीदार नहीं हो सकता . वास्तव में पुत्र के पैर में लगी हुई चोट को पुत्र ही भोगता है . माता - पिता केवल बाहर से हाय - हाय किया करते है . बहुत करते हैं , दवाई - पानी करते हैं . परन्तु भोग तो पुत्र को ही भोगना पड़ता है . इसी प्रकार सबका समझ लीजिये .

एक घर , एक समाज में रहते हुए अपने - अपने कर्मानुसार सबके कर्म - फल , सबके गुण - स्वभाव पृथक हैं . एक ही घर में तामसी मनुष्य क्रोध में जलता रहता है , राजसी नाना विषय में दुखी रहता है और सात्विक व्यक्ति संतुष्ट और शांत रहता है . अपने गुण - स्वभाव और कर्म ही लोक परलोक में साथी हैं . अतः सबकी आशा त्यागकर अपने सुधार में शीघ्र लगना चाहिए . 
भारत मे भाषाई राज्यों का गठन - इसकी वजह से क्षेत्रीय भाषाएं अपना गढ़ बना चुकी हैं और संगठित होकर पूरे राष्ट्र को एक भाषा में पिरोने के विरुद्ध संघर्ष में शामिल हो रहे हैं. हमने यह गलती तो कर दी किंतु इससे पार पाने में असमर्थ हैं. स्वाभाविक है कि भाषाई राज्यों में राज्य की राजभाषा (राज-काज की भाषा कही जा सकती है) सर्वोपरि होगी एवं वहां किसी को देश के लिए एक अन्य भाषा सीखने के लिए मजबूर करना शायद न्यायोचित ही न हो. जिसे राष्ट्र-स्तर पर कुछ करना ही न हो, वह राष्ट्र के स्तर की भाषा सीखे ही क्यों ? जिसे अंग्रेजी संबंधी कार्यों से कोई वास्ता ही न हो तो वह अंग्रेजी क्यों सीखे ? बात समझ में आती है. किसी गाँव के एक छोटे किसान या मजदूर का काम वहाँ की भाषा जान लेने मात्र से सम्पन्न हो जाता है तो वह किसलिए हिंदी या अंग्रेजी सीखे ?


अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन - 

फिलहाल परेश मुम्बई से प्रकाशित होने वाली बंबई समाचार,( यूएनएफपीए , भारत की राष्ट्रीय सहकारी संघ द्वारा प्र्रकाशित पाक्षिक पत्रिका को-आप हारिजन, पांच शहरी महानगरीय और राजनीतिक मुद्दों पर दिल्ली से प्रकाशित नाइबरहूड फ्लैस के फ्री लांसिंग की. उनकी व्यंग्यात्मक तथा हास्यरस से भरपूर न्यूयॉर्क टाइम्स , इंटरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून ( पेरिस ) , लॉस एंजिल्स टाइम्स , वर्ल्ड प्रेस, रिव्यू, द गार्डियन, आॅएस्ट फ्रांस , टाइम, कौरियर इंटरनेशनल आदि के साथ जुड़ कर वह विभिन्न आन लाइन प्रोजेक्ट के लिए काम कर रहे हैं तथा अपनी कार्टूनों को दुनिया भर के विभिन्न अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों में प्रकाशित कर रहे हैं . भारत में वह फाइंनाशियल एक्सप्रो, इंडिया टुडे, इलीस्ट्रटेड विक्ली आफ इंडिया, द सन जिरो आवर, समयुक्त कर्नाटक, द इस्टर्न टाइम्स आदि के लिए भी काम कर रहे हैं. वह 2005 के बाद से दुबई और संयुक्त अरब अमीरात से प्रकाशित अंग्रेजी  दैनिक समाचार पत्र खलीज टाइम्स के लिए भी काम कर रहे है. 

जहां आस्था, विश्वास, पूजा-पद्धति व ईश्वर का नाम, स्वरूप और संदेश सब कुछ बदल जाते हैं। इस दौरान पुराने को जड़ से उखाड़ फेंकने की कोशिश की जाती है और इस तरह पुराने व नये के बीच वर्चस्व की लड़ाई प्रारंभ हो जाती है। भाषा, मनोरंजन, संगीत और कला में भी समय-समय पर जबरदस्त बदलाव हुए और कुछ एक घटना को उस क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन के रूप में देखा गया। यही नहीं, शासक के बदलते ही शासन व्यवस्था ही नहीं बदलती समाज की संस्कृति में भी परिवर्तन आने लगता है। विज्ञान का विकास समाज की दशा व दिशा तय करता है और सभ्यता परिवर्तन में अहम रोल अदा करता है। इसे वैज्ञानिक क्रांति के रूप में देखा जाना चाहिए। वर्तमान में, विश्व संक्रमण काल से गुजर रहा है। असमानता और असंतोष बढ़ रहा है। अराजकता चरम सीमा पर है।


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