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जिंदगी में कैसे -कैसे दिन यहाँ आए
रेल की दो पटरियों से ,मिल नही पाये

एक ही तो वृक्ष के हम डाल थे,
एक जैसे तो हमारे चाल थे ,
पर पवन में हिल नही पाये
जिंदगी में कैसे - कैसे दिन यहाँ आए

भावनाओं में जहाँ संवेदना का घोल था ,
एक दूजे के लिए पल -पल सदा अनमोल था
समय की चादर फटी ,हम सिल नही पाये
जिंदगी में कैसे -कैसे दिन यहाँ आए


यह कविता रचना दुबे द्वारा लिखी गयी है, जो कि कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिन्दी (प्रतिष्ठा) में अध्ययन रत है।

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