जिंदगी में कैसे -कैसे दिन यहाँ आए

जिंदगी में कैसे -कैसे दिन यहाँ आए
रेल की दो पटरियों से ,मिल नही पाये

एक ही तो वृक्ष के हम डाल थे,
एक जैसे तो हमारे चाल थे ,
पर पवन में हिल नही पाये
जिंदगी में कैसे - कैसे दिन यहाँ आए

भावनाओं में जहाँ संवेदना का घोल था ,
एक दूजे के लिए पल -पल सदा अनमोल था
समय की चादर फटी ,हम सिल नही पाये
जिंदगी में कैसे -कैसे दिन यहाँ आए


यह कविता रचना दुबे द्वारा लिखी गयी है, जो कि कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिन्दी (प्रतिष्ठा) में अध्ययन रत है।

5 टिप्पणियाँ:

kshama ने कहा…

Behad sundar rachna...khaas kar aaj ke halaton ke maddenazar rakhte hue!

वन्दना ने कहा…

ek behtreen rachna hai.

शोभना चौरे ने कहा…

aaj ke samajik bdlav ko pesh karti anupm rachna .

Dev ने कहा…

Bahut deep rachana...Hindi ki etani sundar rachan aur hindi ke prchar me aapke yogdan ko yaad kiya jayega...u r doing a great job..

Regards

Sandhya ने कहा…

good..mujhe tumhari kavita bahut pasand aai..keep it up!!

एक टिप्पणी भेजें

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !

Next previous home