शमशेर बहादुर सिंह
शमशेर बहादुर सिंह , हिन्दी के सर्वाधिक प्रयोगशील कवि है। इनका जन्म १३ जनवरी ,१९११ में देहरादून में एक मध्यवर्गीय जाट परिवार में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा देहरादून में हुई । बाद में इन्होने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से १९३३ में बी.ए.की परीक्षा पास की। १९३० में ही इनका विवाह हुआ था, लेकिन कुछ ही बर्षो में इनकी पत्नी का देहांत हो गया। इन्होने दुबारा विवाह से इनकार कर दिया । सर्वप्रथम शमशेर जी, 'रूपाभ' से जुड़े। इसके बाद वे 'कहानी' तथा 'नया साहित्य' आदि के संपादक -मंडल में कार्यरत रहे। रामविलास शर्मा और शिवदान सिंह चौहान के संपर्क में आने से इनका झुकाव मार्क्सवादी चिंतन की तरफ़ गया ,जिससे ये प्रगतिशील आन्दोलन के साथ जुड़ गए।शमशेर जी,दिल्ली विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में कोष से सम्बंधित कार्य करते रहे। इन्होने विक्रम विश्वविद्यालय ,उज्जैन में भी काफ़ी समय तक कार्य किया। इन पर उर्दू और अंग्रेजी साहित्य का भी गहरा प्रभाव रहा है। शमशेर बहादुर सिंह जी की चित्रकला में भी विशेष रूचि थी। सहज और संकोची स्वभाव के कारण ,ये आत्म-प्रचार से दूर रहे। गंभीरता ,सहनशीलता और सहजता ,इनके व्यक्तित्व का मूल तत्व रहा है। अन्य कवियों की तुलना में इन्होने कवितायें कम लिखी है,किंतु कविताओं के शिल्प को तराशने में इन्होने अपूर्व कुशलता का परिचय दिया है। शमशेर जी का देहांत १२ मई १९९३ में अहमदाबाद में हृदयगति रुक जाने के कारण हुई।
शमशेर बहादुर सिंह,प्रगतिशील और प्रयोगशील कवि है। बौद्विक स्तर पर वे मार्क्स के द्वंदात्मक भौतिकवाद से प्रभावित है तथा अनुभवों में वे रूमानी एवं व्यक्तिवादी जान पड़ते है। उनकी काव्यदृष्टि सुदीर्घ एवं बहुआयामी है,किंतु उनमे एक तरह का अंतद्वंद विद्धमान है,इसीलिए उनका काव्य जगत बहुत ही अमुखर और शांत है। विजयदेव नारायण शाही ने शमशेर की काव्य -कला का विश्लेषण करते हुए लिखा है -" तात्विक दृष्टि से शमशेर की काव्यनुभूति सौन्दर्य की ही अनुभूति है। शमशेर की प्रवृति सदा की वस्तुपरकता को उसके शुद्ध और मार्मिक रूप में ग्रहण करने में रही है। वे वस्तुपरकता का आत्म-परकता में और आत्म-परकता का वस्तुपरकता में अविष्कार करने वाले कवि है। जिनकी काव्यानुभूति बिम्ब की नही बिम्बलोक की है।" शमशेर की रचनात्मकता का लक्ष्य है - अपने आपको देख पाना। इनकी 'बात -बोलेगी' कविता इस तथ्य का उदाहरण है -
बात बोलेगी
हम नही
भेद खोलेगी
बात ही।
सत्य का
क्या रंग
पूछो,एक रंग
एक जनता का दुःख एक
हवा में उड़ती पताकायें अनेक
दैन्य दानव । क्रूर स्थिति ।
कंगाल बुद्धि : मजदुर घर भर
एक जनता का अमर वर :
एकता का स्वर
अन्यथा स्वातंत्र इति।
हम नही
भेद खोलेगी
बात ही।
सत्य का
क्या रंग
पूछो,एक रंग
एक जनता का दुःख एक
हवा में उड़ती पताकायें अनेक
दैन्य दानव । क्रूर स्थिति ।
कंगाल बुद्धि : मजदुर घर भर
एक जनता का अमर वर :
एकता का स्वर
अन्यथा स्वातंत्र इति।
शमशेर की कविता में ,वे सारे गुण एवं लक्षण है, जो की प्रगतिशील कविता में उपलब्ध होते है । जैसे - लोकमंगल की भावना ,जनतांत्रिकता ,प्रेम और सौन्दर्य ,मानवीय करुणा एवं संवेदना आदि, किंतु उसे व्यक्त करने का उनका जो ढंग है ,शैली है ,उस कारण उनकी कविता सामान्य पाठकों के लिए ही नही ,विशिष्ट पाठकों के लिए भी दुरूह हो जाती है। वास्तव में इनकी कविता के दो छोर है - कुछ बोधगम्य सरल कवितायें और कुछ नितांत जटिल कवितायें । जटिल कवितायें इनकी अवचेतन मन की सृष्टियाँ है। बिम्ब चित्रों ,प्रतीकों और अत्यन्त असम्बद्ध स्थितियों के चित्रण से इनकी कविता साधारण पाठक की समझ एवं पकड़ से बहुत दूर चली जाती है। कुछ विद्वानों ने इन्हे भले ही कवियों का कवि कहा हो,इसका कारण यह भी हो सकता है कि कवि ह्रदय संपन्न मनीषी वर्ग भी,शमशेर को समझ पाने में अपने आपको असमर्थ पाता है। एक उदाहरण देखिये :-
सींग और नाखून
लोहे के बख्तर कन्धों पर।
सीने में सुराख हड्डी का।
आंखों में :घास काई की नमी ।
एक मुर्दा हाथ
पाँव पर टिका
उलटी कलम थामे
तीन तसलों में कमर का घाव सड़ चुका है।
जड़ों का भी कड़ा जाल
हो चुका पत्थर ।
रचना कर्म :-
काव्य :- कुछ कवितायें ,इतने पास अपने ,उदिता ,चुका भी हूँ नही मै।
डायरी - शमशेर की डायरी
लोहे के बख्तर कन्धों पर।
सीने में सुराख हड्डी का।
आंखों में :घास काई की नमी ।
एक मुर्दा हाथ
पाँव पर टिका
उलटी कलम थामे
तीन तसलों में कमर का घाव सड़ चुका है।
जड़ों का भी कड़ा जाल
हो चुका पत्थर ।
विजयबहादुर सिंह एवं डॉ.सूरज पालीवाल ने इस सम्बन्ध में उचित एवं संगत बात कही है - 'शमशेर में वस्तुतः रोमांटिक विदग्धता के सूत्र जब तक हमारे हाथ में नही आते ,कवि की काव्यानुभूति तक किसी भी स्थिति में हमारी पहुँच संभव नही ।' "शमशेर की पहचान कवि रूप में है और कवि भी सामान्य नही ,दुरूह कवि ,जिसे उनकी कविताओं में आए शब्दों से नही ,शब्दों के पीछे कवि की संवेदना और उसके गहरे जीवनानुभवों की अनुभूति के साथ ही समझा जा सकता है।'
अतः शमशेर जी ,अतीव कल्पनाशील कवि है।रचना कर्म :-
काव्य :- कुछ कवितायें ,इतने पास अपने ,उदिता ,चुका भी हूँ नही मै।
डायरी - शमशेर की डायरी
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8 टिप्पणियाँ
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18 अगस्त 2009 2:25 pm
aapake aalekh bahut gianvardhak hote hain magar padhane me dikkat aati hai ki kya padhen agar ek ek kar ke den to sahi hoga itane alekh eh din me padhana sambhav nahin hota yaa shayad mujhe hi samajhane me pareshaani ati hai aaj hindi font nahin chal raha mafi chahati hoon aabhaar
8 सितम्बर 2009 7:05 pm
nice
13 सितम्बर 2009 10:13 pm
Sahityakaron se parichit karvane ki aapne srahniy blog patrika nikali hai ....aabhar ...!!
20 सितम्बर 2009 1:29 pm
bahut achha aalekh
24 मई 2010 10:55 pm
kavi se sambandhit buniyadi jankari ke liye uttam.
15 जून 2010 12:24 am
शमशेर बहादुर सिंह पर आलेख बहुत ज्ञानवर्धक और लगा . बहुत बहुत धन्यवाद !
22 जून 2011 2:32 pm
bahut acchi jankari mili
30 अक्तूबर 2011 12:43 am
shamsher ji par kitne hee drishtikon hain aur sab sahi prteet hote hain.. kitne gahre kavi the ve.. viral.. abhaar..sundar lekh ke liye badhai.