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हिन्दी साहित्य के आकाश में महाकवि सूरदास सूर्य के रूप में विद्यमान है। अष्टछाप के कवियों में सूरदास सर्वश्रेष्ठ कवि थे। इनके जन्म स्थान ,जन्म तिथि ,अंधत्व तथा जाती के सम्बन्ध में विद्वानों में बड़ा मतभेद है। सूरसाहित्य के विद्वान इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि सं.१५३५ की बैसाख शुक्ल ५ को इनका जन्म हुआ। इनका जन्म बल्लभगढ़ (गुडगाँव) के निकट सीही नामक गाँव में हुआ था। ये एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण के चतुर्थ पुत्र थे। इसके अतिरिक्त इनके माता-पिता ,कुटुम्बी जनों एवं बंधू -बांधवों का कुछ भी पता नही है। इनके अंधत्व के सम्बन्ध में भी मतभेद है। कुछ विद्वान सूरदास को जन्मांध मानते है और स्वयं सूरदास ने अपने को "जन्म को आंधरो" कहा है। किंतु सूर के काव्य में जिस प्रकार सुश्च्म,यथार्थ ,पारदर्शी एवं सर्वागीण वर्णन मिलता है ,उसे देख कर यह नही लगता कि वे जन्मांध थे। सूरदास का साहित्य किसी जन्मांध व्यक्ति का लिखा हुआ नही हो सकता


बचपन में ही सूरदास घर त्याग का मथुरा में गौघाट में आकर रहने लगे। यहाँ पर वे दास्य भाव से कृष्ण के विनय के पद गाया करते थे। इनकी ख्याति सुन कर वल्लभाचार्य ,जब मथुरा आए,तो सूरदास ने उन्हें " प्रभु हौ सब पतितन को टीकौ" गाया जिसे सुनकर वल्लभाचार्य ने कहा " जो सूरे हैके ऐसो कहो को घिघियात हैकछु भगवत -लीला वर्णन करि।" वल्लभाचार्य ने उन्हें पुष्टिमार्ग में दीक्षित किया और कालांतर में श्रीनाथ जी के मन्दिर में प्रात: सेवा का काम सौपा । वल्लभाचार्य जी ने सूरदास को कृष्ण लीला से परिचित करवाया । सूरदास जी का देहांत पारसौली में १६१० ई.में हुआ ।
सूरदास की ३ प्रमुख रचनायें मानी जाती है - "सूरसागर", "साहित्यलहरी" एवं "सूरसारावली" । परन्तु इनकी अक्षय ख्याति का कारण सूरसागर है।इसमे सवालाख पद बताये जाते है,किंतु खोज करने पर भी ५ हज़ार से अधिक पद नही मिल सके है। सूरसागर की रचना श्रीमदभागवत के आधार पर हुई है, परन्तु फिर भी उसे भागवत का अनुवाद नही माना जा सकता । सूरसागर में सूर की मौलिक काव्य प्रतिभा विद्दमान है।
सूरदास जी अष्टछाप के कवियों में सर्वश्रेठ कवि माने जाते है। महाकवि सूर अन्य भक्त कवियों की तरह एक उच्च कोटि के भक्त पहले माने जाते है,कवि बाद में। कविता करना इनका मुख्य लक्ष्य नही था। सूर का वात्सल्य एवं श्रृंगार वर्णन हिन्दी साहित्य की अमर निधि है। इन्होने बड़ी तन्मयता से श्रीकृष्ण की बाल लीलाओ का चित्रण किया है। श्रृंगार चित्रण में संयोग और वियोग दोनों का ही मार्मिक एवं हृदयग्राही वर्णन किया है। सूर का काव्य गहराई का काव्य है,विस्तार का नही। सूरदास अपने समय के आध्यात्मवाद का प्रतिनिधित्व करते है,साथ ही वे एक ऐसे मार्ग पर सामान्य जनता को ले जाते है ,जो रास्ता पूर्ण प्रशस्त एवं अंध धार्मिकता से परे थे। सूरदास के भगवान् श्रीकृष्ण हर समय- हर स्थान पर लीला करने वाले है,जो अपने भक्तो की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते है,साथ ही सूरदास की प्रतिभा पुष्टिमार्गी सिद्धांतो में दीक्षित होकर और निखर गई,जिसकी आभा सम्पूर्ण समाज एवं साहित्य जगत पर बिखेर गई :
"सूर-सूर तुलसी ससी ,उडुगन केशवदास
अबके कवि खद्योत सम ,हुं हुं करत प्रकाश।।
उत्तम पद कवि गंग के ,कविता के बलवीर
केशव अर्थ गंभीरता ,सूर तीन गुन धीर।।"

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  1. aapke blog par itne moolyavaan lekh padhne ko mil rahe hain uske liye dhanyavaad.
    aap is lekh mein yadi soordas ji ki kuch krishna virah aur shringar ki rachnayein bhi dal dete to aur bhi achcha hota.kuch unka likha hamein yahin par padhne ko mil jata aur hum aur bhi anugrahit ho jate.

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  2. इतने छोटे आलेख में आपने ढेर सारी जानकारियां भर दी हैं .. पढकर बहुत अच्‍छा लगा .. धन्‍यवाद !

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  3. मित्र बेहतरीन पोस्‍ट, छात्रों के लिये तो बहुत ही उपयोगी

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  4. रोचक
    आपकी चिठ्ठी चर्चा समयचक्र में

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  5. रोचक और महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए आप श्रीमान जी को धन्यवाद
    -एक रचना प्रस्तुत
    मै में जमी सीढ़ियां दरकने लगीं |
    मौन बैठे कारवां फुदकने लगे ||
    दुसरे के गिरेवान जो झांकते रहे |
    अपने गिरवा को टटोलते मिले ||

    उत्तर देंहटाएं
  6. रोचक और महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए आप श्रीमान जी को धन्यवाद
    -एक रचना प्रस्तुत
    मै में जमी सीढ़ियां दरकने लगीं |
    मौन बैठे कारवां फुदकने लगे ||
    दुसरे के गिरेवान जो झांकते रहे |
    अपने गिरवा को टटोलते मिले ||

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