अभी न होगा मेरा अन्त/ निराला

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला 
अभी न होगा मेरा अन्त
अभी-अभी ही तो आया है
मेरे वन में मृदुल वसन्त-
अभी न होगा मेरा अन्त

हरे-हरे ये पात,
डालियाँ, कलियाँ कोमल गात!

मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर
फेरूँगा निद्रित कलियों पर
जगा एक प्रत्यूष मनोहर

पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लूँगा मैं,
अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं,

द्वार दिखा दूँगा फिर उनको
है मेरे वे जहाँ अनन्त-
अभी न होगा मेरा अन्त।

मेरे जीवन का यह है जब प्रथम चरण,
इसमें कहाँ मृत्यु?
है जीवन ही जीवन
अभी पड़ा है आगे सारा यौवन
स्वर्ण-किरण कल्लोलों पर बहता रे, बालक-मन,

मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बन्धु, दिगन्त;
अभी न होगा मेरा अन्त।



सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला " ने अपना जीवन परिचय एक पंक्ति में देते हुए लिखा है ,"दुःख ही जीवन की कथा रही"। सच में निराला का जीवन दुखों से भरा था और उन दुखों को चुनौती देने ,उनसे जूझने और उन्हें परास्त करने में ही उनका निरालापन था।
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यशपाल के चित्र

प्रिय मित्रों , हिन्दीकुंज में हिन्दी साहित्यकारों की चित्र श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है . आज इस कड़ी में प्रस्तुत है - 'यशपाल के चित्र' . आधुनिक हिन्दी साहित्यकारों में यशपाल का नाम प्रमुख है . प्रेमचंद के बाद जिन साहित्यकारों ने जनवादी चेतना को प्रखर दृष्टि दी ,उनमें यशपाल अग्रणी है. ये एक ही साथ क्रांतिकारी व साहित्यकार दोनों रूपों में जाने जाते है . 
आशा है कि आप सभी को यह चित्र पसंद आयेंगे . 
धन्यवाद. 












आप इन चित्रों को यहाँ से डाउनलोड करें 


सौजन्य : विप्लव.कॉम 
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चप्पल (२)/ कमलेश्वर

कमलेश्वर 
गतांक  से आगे ...
वार्ड बॉय बच्चे की कुर्सी को पुश करता हुआ ऑपरेशन थिएटर वाले बरामदे में मुड गया नर्स उसके साथ ही चली गयी उसका बाप धीरे-धरे उन्हीं के पीछे चला गया .
तब मुझे याद आया कि मुझे तो सातवीं मंज़िल पर जाना था संध्या वहीं थी मैं सीढ़ियों से एक मंज़िल उतर आया संध्या के डॉक्टर पति ने मुझे पहचाना और आगे बढ़कर मुझसे हाथ मिलाया हाथ की पकड में मायूसी और लाचारी थी क़ुछ पल खामोशी रही फ़िर मैंने कहा , मैं कल ही वापस आया तभी पता चला यह एकाएक कैसे हो गया ?
-- नहीं, एकाएक नहीं, ब्लीडिंग तो पहले भी हुई थी पर तब कंट्रोल कर ली गयी थी पंद्रह दिनों बाद फिर होने लगी एक्सेसिच ब्लीडिंग चार घंटे ऑपरेशन में लगे एंड यू नो, वी डॉक्टर्स आर वर्स्ट पेशेंट्स! वो संध्या के बारे में भी कह रहे थे संध्या भी डॉक्टर थी .
-- यस! आप तो सब समझ रहे होंगे संध्या को भी एक -एक बात का अंदाज़ हो रहा होगा ! मैंने कहा .
-- लेकिन वो बहुत करेजसली बिहेव कर रही है ! संध्या के डॉक्टर पति ने कहा , बोल तो सकती नहीं पल्स भी गर्दन के पास मिली अर्टीफ़िशियल रेस्परेशन पर है एक तरह से देखिए तो उसका सारा शरीर आराम कर रहा है और सब कुछ आर्टीफ़िशिल मदद से ही चल रहा है , संध्या के डाक्टर पति ज्यादातर बातें मुझे मेंडिकल टर्म्स में ही बताते रहे और मैं उन्हें समझने की कोशिश करता रहा बीच -बीच मैं इधर-उधर की बातें भी करता रहा .
संध्या का  भी आज सुबह पहुंच गया क़िसी तरह उसे जापान होते हुए टिकट मिल गया ! उन्होंने बताया .
यह बहुत अच्छा हुआ मैंने कहा .
आप देखना चाहेंगे ?
हां, अगर पॉसिबिल हो तो ...
आइए देख तो सकते हैं भीतर जाने की इजाज़त नहीं है वैसे तो सब डॉक्टर फ्रेंड्स ही हैं, पर ...
नहीं-नहीं, वो ठीक भी है ...
वो बोल भी नहीं सकती वैसे आज कांशस है क़ुछ कहना होता है तो लिख के बता देती है उन्होंने कहा और एक केबिन के सामने पहुंचकर इशारा किया .
मैंने शीशे की दीवार से संध्या को देखा वह पहचान में ही नहीं आयी दो डॉक्टर और नर्स उसे अटैंड भी कर रहे थे और फिर इतनी नलियां और मशीनें थीं कि उनके बीच संध्या को पहचानना मुश्किल भी था.
संध्या होश में थी ड़ॉक्टर को देख रही थी ड़ॉक्टर उसका एक हाथ सहलाते हुए उसे कुछ बता रहा था मैंने संध्या को इस हाल में देखा तो मन उदास हो गया वह कितनी लाचार थी बीमारी और समय के सामने आदमी लाचार होता है क़ुछ कर नहीं पाता मैंने मन ही मन संध्या के लिए प्रार्थना की , किससे की यह नहीं मालूम -ऐसी जगहों पर आकर भगवान पर ध्यान जाता भी है और किसी के शुभ के लिए उसके अस्तित्व को स्वीकार कर लेने में अपना कुछ नहीं जाता -सिवा प्रार्थना के कुछ शब्दों के .
हम आई सीयू से हटकर फिर बरामदे में आ गये वहां बैठने के लिए कोई जगह नहीं थी बरामदे बैठने के लिए बनाये भी नहीं गये थे संध्या या डॉक्टर की बहन नीचे चाद बिछाये बैठी थी ड़ॉक्टर के कुछ दोस्त एक गुच्छे में खड़े थे
अभी तो, बाद में, एक ऑपरेशन और होगा संध्या के डॉक्टर पति ने बताया, तब छोटी आंत को सिस्टम से जोड़ा जायेगा ख़ैर पहले वो स्टेबलाइज़ करे, फिर रिकवरी का सवाल है उसके बाद मैं सोचता हूं - उसे अमेरिका ले जाऊंगा !
यह ठीक रहेगा!
इसके बाद हम फिर इधर-उधर की बातें करते रहे मैं संध्या की संगीन हालत से उनका ध्यान भी हटाना चाहता था इसके सिवा मैं और कर भी क्या सकता था , और डॉक्टर के सामने यों खामोश खड़े रहना अच्छा भी नहीं लग रहा था, यह जताते हुए कि अस्पताल वालों से छुपाकर मैं सिगरेट पीना चाहता हूं - मैं खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया बाहर लू चल रही थी नीचे धरातल पर कुछ लोग आ-जा रहे थे वे ऊपर से बहुत लाचार और बेचारे लग रहे थे और मेरे मन से सबके शुभ के लिए सद्भावना की नदियां फूट रही थीं एेसे में तुम सोचो - लगता है मनुष्य ने मनुष्य के साथ तो सघन और उदात्त संबंध बना लिए हैं, पर ईश्वर के साथ वह ऐसा नहीं कर पाया है मनुष्य अपने ईश्वर के दु :ख-सुख में शामिल नहीं हो सकता ईश्वर से उसका सबंध सिर्फ दाता और पाता का है वहदेता है और मनुष्य पाता है क़ितना इकतरफा रिश्ता है यह और फिर अगर तुम यह भी मान लो कि ईश्वर ही मनुष्य को बनाता तो ईश्वर की क्षमता पर विश्वास घटने लगता है - सृष्टि के आदि से वह मनुष्य को बनाता आ रहा है परंतु असंख्य प्राणियों को बनाने के बावजूद वह आज तक एक सहज संपूर्ण और मुकम्मिल मनुष्य नहीं बना पाया क़ुछ कमी कहीं तो ईश्वर की व्यवस्था में भी है हो सकता है उनका आदि -कलाकार कुंभकार उन्हें मिट्टी सप्लाई करने में कुछ घपला कर रहा हो ऌस रहस्य का पता कौन लगायेगा? रहस्य ही रहस्य को जन्म देता है शायद इसीलिए मनुष्य ने ईश्वर को रहस्य ही रहने दिया ज़ो सत्ता या शक्ति विश्वास के निकष पर खरी न उतरे , उसे रहस्य बना देना ही बेहतर है और किया भी क्या जा सकता ...
लू के एक थपेड़े ने मेरा मुँह झुलसा दिया। ड़ॉक्टर अपने चिंताग्रस्त शुभचिंतकों के गुच्छे में खड़े थे- और सबके चेहरे कुछ ज्यादा सतर्क थे।
ब्लडप्रेशर गिर रहा है
आईसीयू में डॉक्टरों और नर्सो की आमदरफ्त से लग रहा था कि कोई कठिन परिस्थिति सामने है क़ुछ देर बाद पता चला कि नीडिल कुछ ढीली हो गयी थी उसे ठीक कर दिया गया है और ब्लडप्रेशर ठीक से रिकॉर्ड हो रहा है सबने राहत की सांस ली मौत से लड़ना कोई मामूली काम नहीं है ईश्वर ने तो मौत पैदा की ही है , पर मौत तो मनुष्य भी पैदा करता है एक तरफ जीवन के लिए लड़ता है ओर दूसरी तरफ मौत भी बांटता है- यह द्वंद्व ही तो जीवन है यह द्वंद्व और द्वैत ही जीवित रहने की शर्त है और अद्वैत या समानता तक पहुंचने का साधन और आदर्श भी आध्यात्मिक अद्वैत जब भौतिकता की सतह पर आता है और मनुष्य के प्रश्न सुलझाता है तभी तो वह समवेत समानता का दर्शन कहलाता है .........
सिगरेट से मुंह कड़वा हो गया था लू वैसे ही थपेड़े मार रही थी सीमेंट के पलस्तर का दहकता-चिलचिलाता तालाब सामने फैला था - कोई एक आदमी जलते नंगे पैरों से उसे पार कर रहा था .
मैंने पलटते हुए लिफ्ट की तरफ देख ड़ॉक्टर मेरा आशय समझ गये थे, लेकिन तभी राजनीतिज्ञ- से उनके कोई दोस्त आ गये थेशुरू की पूछताछ के बाद वे लगभग भाषण-सा देने लगे, अब तो अग्नि मिसाइल के बाद भारत दुनिया का सबसे शक्तिशाली तीसरा देश हो गया है और आने वाले दस वर्षो में हमें अब कोई शक्ति -महाशक्ति बनने से नहीं रोक सकती इंग्लैंड और फ्रांस की पूरी जनसंख्या से ज्यादा बड़ा है आज भारत का मध्यवर्ग अपनी संपन्न्ता में भारतीय मध्यवर्ग जैसी शक्ति और संपन्नता उन देशों के मध्यवर्ग के पास भी नहीं है ........
तभी एक चिंताग्रस्त नर्स तेज़ी से गुजर गयी और सन्नाटा छा गया चिंता के भारी क्षण जब कुछ हल्के हुए तो मैंने फिर लिफ्ट की तरफ देखा ड़ॉक्टर साहब समझ गये, आपको ढाई -तीन घंटे हो गये क्या-क्या काम छोड़ के आये होंगे अौर वे लिफ्ट की ओर बढ़े लिफ्ट आयी , पर वह ऊपर जा रही थीड़ॉक्टर साहब को मेरी खातिर रूकना न पड़े, इसलिए मैं लिफ्टमैं घुस गया .
लिफ्ट आठ पर पहुंचा वहाँ ज्यादा लोग नहीं थे पर एक स्ट्रेचर था और दो -तीन लोग। स्ट्रेचर भीतर आया उसी के साथ लोग भी स्ट्रेचर पर चादर में लिपटा बच्चा पड़ा हुआ था वह बेहोश था वह आपरेशन के बाद लौट रहा था उसके गालों और गर्दन के रेशमी रोएं पसीने से भीगे हुए थे माथे पर बाल भी पसीने के कारण चिपके हुए थे .
उसका बाप एक हाथ में ग्लूकोज की बोतल पकड़े हुए था ग्लूकोज की नली की सुई उसकी थकी और दूधभरी बांह की धमनी में लगी हुयी थी उसका बाप लगातार उसे देख रहा था वह शायद पसीने से माथे पर चिपके उसके बालों को हटाना चाहता था , इसलिए उसने दूसरा हाथ ऊपंर किया, पर उस हाथ में बच्चे की चप्पलें उसकी उंगलियों में उलझी हुई थीं वह छोटी -छोटी नीली हवाई चप्पलें ..........
मैंने बच्चे को देख फ़िर उसके निरीह बाप को.
मेरे मुंह से अनायास निकल हो गया इसका...
इसकी टांग काटी गयी है वार्ड बॉय ने बाप की मुश्किल हल कर दी.
ओह! कुछ हो गया था? मैंने जैसे उसके बाप से ही पूछावे मुझे देखकर चुप रह गये उसके ओठ कुछ बुदबुदाकर थम गये लेकिन वह भी चुप नहीं रह सका एक पल बाद ही बोला, जांघ की हड्डी टूट गयी थी.........
चोट लगी थी ?
नहीं सड़क पार कर रहा था एक गाड़ी ने मार दिया, वह बोला और मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे टक्कर मारने वाली गाड़ी फिर वह वीतराग होकर अपने बेटे को देखने लगा .
पांचवीं मंज़िल पर लिफ्ट रूकी बच्चों का वार्ड इसी मंजिल पर था लिफ्ट में आने वाले कई लोग थे वे सब स्टै्रचर निकाले जाने के इंतज़ार में बेसब्री से रूके हुए थे... वार्ड बॉय ने झटका देकर स्ट्रेचर निकाला तो बच्चा बोरे की तरह हिल उठा, अनायास ही मेरे मुंह से निकल गया, धीरे से ...
ये तो बेहोश है इसे क्या पता ? स्ट्रेचर को बाहर पुश करते हुए वार्ड बॉय ने कहा .
उस बच्चे का बाप खुले दरवाजे से टकराता हुआ बाहर निकला तो एक नर्स ने उसके हाथ की ग्लूकोज की बोतल पकड़ ली.
लिफ्ट के बाहर पहुंचते ही उसके बाप ने उसकी दोनों नीली हवाई चप्पलें वहीं कोने में फेंक दीं फ़िर कुछ सोचकर कि शायद उसका बेटा होश में आते ही चप्पलें मांगेगा, उसने पहले एक चप्पल उठाई......... फ़िर दूसरी भी उठा ली और स्ट्रेचर के पीछे-पीछे वार्ड की तरफ जाने लगा .
मुझे नहीं मालूम कि उसका बेटा जब होश में आयेगा तो क्या मांगेगा- चप्पल मांगेगा या चप्पलों को देखकर अपना पैर मांगेगा ...
बेसब्री से इंतज़ार करते लोग लिफ्ट में आ गये थे। लिफ़्टमैन ने बटन दबाया। दरवाज़ा बंद हुआ। वह लोहे का बंद कमरा नीचे उतरने लगा...
                 समाप्त 
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राष्ट्रीय भावना की कमी/विचार मंथन

मनोज सिंह 
भारतीय उपमहाद्वीप, अर्थात विश्व की प्राचीनतम सभ्यता। एक राष्ट्र के रूप में हमारा इतिहास बेशक लंबा रहा हो मगर उसका रूप-स्वरूप सदा बदलता रहा, जो हमारी प्रवृत्तियों और कमजोरियों को बखूबी प्रदर्शित करता है। यही नहीं, हमारे भूतकाल का बड़ा कालखंड गुलामी में बीता। दुनिया की शायद ही कोई मनुष्य प्रजाति रही हो जिसने यहां आकर लूट-खसोट और अधिकार जमाते हुए हम पर शासन न किया हो। और हम विभिन्न विदेशी शासकों के अधीन खुशी-खुशी सालों-साल शासित रहे। कह सकते हैं कि इस दौरान हम गुलाम रहने के आदी बन चुके थे। यह धीरे से कब हमारा स्वभाव बन गया हमें पता ही नहीं चला। हमारी संस्कृति में भी शासकों के रंग घुलते-मिलते चले गये। हमारी अति प्राचीन वर्ण-व्यवस्था एवं जातिप्रथा में भी शासक-शासित की बू आती है। सच पूछा जाये तो अब हम एक ऐसी भीड़ में रूपांतरित हो चुके हैं जो समय-काल में धीरे-धीरे काफी हद तक स्वकेंद्रित व स्वार्थी हो चुकी है। इसका परिणाम यह हुआ कि हम बाहर के व्यक्ति से अपनी आत्मसुरक्षा के नाम पर भी संघर्ष नहीं करते, उलटा उसका स्वागत करते हैं, लेकिन आपस में वर्चस्व की लड़ाई खूब लड़ते हैं। हम अपने ही घर में ताल ठोंकते रहते हैं और एक-दूसरे को देख सीना फूलाने में कसर नहीं छोड़ते। फलस्वरूप हम पर शासन करना बहुत आसान है। हमने अपनी इन कमजोरियों को छिपाने के लिए अनेक शब्दों का आविष्कार किया, कई नई परिभाषाएं रचीं और उनके विशिष्ट अर्थों से स्वयं को अलंकृत किया। सांस्कृतिक, साहित्यिक, धार्मिक-जामा पहनाते हुए दर्शनशास्त्र की नयी-नयी विभिन्न विचारधाराओं से सुशोभित भी कर दिया लेकिन यह हमें किस हद तक नुकसान पहुंचा सकता है, हमें स्वयं नहीं पता। और अगर पता चल भी जाये तो हम अनजान बन जाते हैं। आज यह हमारे अस्तित्व के लिए चुनौती बन चुका है। इसने हमारे अंदर के स्वाभिमान को भी तोड़ा है, मरोड़ा है। हमें कोई एक थप्पड़ मारे तो हम दूसरा थप्पड़ खाने के लिए तैयार रहने की बात तक करते हैं। यह किसी विशिष्ट संदर्भ में तो उचित हो सकता है मगर हमने इसे एक विचारधारा के रूप में पूरे समाज पर थोप देने का प्रयास किया। सच तो यह है कि ऐसा कोई उदाहरण प्रकृति में भी दिखाई नहीं देता। यहां भी अस्तित्व की लड़ाई हर जीवित प्राणी को लड़नी पड़ती है। 
सहअस्तित्व सफल केवल आपसी सामंजस्य से हो सकता है, यह एकतरफा समर्पण से संभव नहीं। कमजोरी से तो कदापि नहीं। समर्पित, हारा हुआ या कमजोर कभी बराबरी नहीं कर सकता। वो अधिकारपूर्वक मांग नहीं कर सकता। उसे मात्र भीख मिल सकती है। उसे दोयम दर्जे का नागरिक कहा जाता है। दया व क्षमा शब्द सामर्थ्यशाली पर ही सुशोभित होते हैं वरना व्यक्ति स्वयं दया का पात्र बनकर रह जाता है। जीवन के इन मूल तथ्यों को हम नजरअंदाज तो कर सकते हैं मगर झुठला नहीं सकते। एक तरफ मानवीय इतिहास हिंसा से भरा हुआ है तो दूसरी तरफ इसे रोकने की तमाम बातें जरूर की जाती हैं, जो कभी पूरी तरह सफल हुई नहीं। क्या किया जाये? मनुष्य के स्वभाव का? यूं तो प्रकृति का संपूर्ण रचना-संसार भी कहीं न कहीं हिंसा पर निर्भर है। मगर सीमाओं में। बात है हिंसा में निहित मायनो, अर्थों व उद्देश्यों को समझने की। कहने को तो मानवीय विकासक्रम में, सामाजिकता के लिए अहिंसक होना आवश्यक है मगर वास्तविकता के धरातल पर यह दिखाई नहीं देता। मानव ने शारीरिक ही नहीं मानसिक हिंसा भी खूब कर रखी है। जो आज भी कई तरह से जारी है। चतुर-चालाक की दुनिया में स्वार्थवश की गयी हिंसा और आत्मसुरक्षा के लिए की गयी हिंसा के बीच लक्ष्मण-रेखा खींचना आसान नहीं। यहां शक्ति के बिना शासन नहीं। और मानव जाति बिना शासन व्यवस्था के समाज की परिकल्पना भी नहीं कर सकती। ऐसी परिस्थितियों के बीच भी हम शासित बने रहने के लिए तत्पर प्रतीत होते हैं। जबकि स्वाभिमान से समझौता कभी भी सराहा नहीं जा सकता। कमजोर हमेशा हंसी का पात्र बनता है। दुनिया में ऐसे लोगों की बहुत कमी है जो हमारे जैसी सोच रखते हैं। साहित्यिक प्रशंसा एवं मात्र वाहवाही के लिए कहने-सुनने और असल जीवन में इसे स्वीकार करके ढालने में फर्क होता है। यह सत्य है कि अति चाहे फिर हिंसा से हो या कायरता की, दुःख देती है। मगर यहां प्रश्न उठता है कि क्या विश्व इतिहास में व्यवस्था के नाम पर शासक की हिंसा को हमेशा जायज नहीं ठहराया गया? समय-समय पर विरोध भी हुये, परिवर्तन भी हुए। मगर क्या नये शासकों को भी हिंसा का सहारा लेना नहीं पड़ा? मगर हम यहां भी भिन्न हैं। यूं तो हमारे ऊपर की गयी ज्यादतियों का विरोध, अंग्रेजी शासनकाल के अतिरिक्त, कहीं पढ़ने-सुनने में भी नहीं आता, ऊपर से जो छिटपुट घटनाएं घटी भी हैं, उन्हें हम इतिहास के पन्नों से गायब करने में अपनी कुशलता का परिचय देने में लगे रहते हैं। हम अपने पुराने क्रूर शासकों के असली रूप को दिखाने में आज भी हिचकिचाते हैं। उलटा धीरे-धीरे उन्हें महिमामंडित करने में प्रयासरत प्रतीत होते हैं। हमारे यहां ऐसे उदाहरण भी कम नहीं जहां सत्‌कर्मी शासक को हमारे ही छल-कपट के कारण सत्ताविहीन होना पड़ा। मजेदारी तो यह देखकर होती है कि हम अपनी इन तमाम ऐतिहासिक असफलताओं को खूबसूरत मोड़ देकर, सीना चौड़ाये खुले में घूमते हैं।
उस समाज का कुछ नहीं हो सकता, जहां बुद्धिजीवी उपरोक्त विचारधारा को पालने में सहायक हों। हद तो तब हो जाती है जब हम दूसरे की दृष्टि से सब कुछ देखते हैं। दूसरों का सम्मान एवं अतिथि-सत्कार किस संस्कृति में नहीं है? लेकिन बाहरी आपके घर में घुसकर मालिक बन जाये यह किसी को स्वीकार्य नहीं। मगर हम इसे भी सहर्ष स्वीकार करते हैं। और फिर इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश भी करते हैं। हमारी मानसिकता में इतनी कमजोरी है कि राष्ट्र-प्रेम और समाज-प्रेम से प्रेरित लोगों को इतना गुमराह कर दिया जाता है कि कई बार तो उन्हें भी अपनी सोच पर भ्रम होने लगता है। अपनी सभ्यता व संस्कृति की बात करना साम्प्रदायिक घोषित कर दिया जाता है जबकि दूसरे की कट्टरता और चालाकी को नजरअंदाज किया जाता है। इस तरह हमने अपने आपको पूरी तरह लाचार और कमजोर बना लिया है। चूंकि दुनिया इतनी सीधी और सरल नहीं है इसलिए इसका भुगतान भी हम करते रहे हैं। बहरहाल, ऐसी सोच अब हमारी आदत में शुमार हो चुकी है। किसी शहर में बड़े से बड़ा हादसा हो जाने के दूसरे दिन शहर की उन्हीं गलियों से भीड़ जब सब कुछ भुलाकर अपने स्वार्थ में पुरानी घटनाओं को रौंदती हुई निकलती है तो हमारे समाचारपत्र, मीडिया, राजनेता, लेखक, जय-जयकार करने लग उठते हैं। कहा जाता है कि देखिये जिंदगी रुकी नहीं। अरे, जिंदगी तो वैसे भी नहीं रुकती! उलटे यह इस बात को दर्शाता है कि हम कितने असंवेदनशील हैं। अपनो की बेवक्त बेवजह मौत पर दो पल आंसू भी नहीं बहाते, चिंता नहीं करते। हमारा समाज के प्रति कोई उत्तरदायित्व नहीं। हमारे साथ कुछ भी हो जाये हमें क्रोध नहीं आता। आक्रोश नहीं पनपता। और अगर आता भी है तो क्षणिक होता है, जो क्रिकेट के खेल की तरह हार-जीत के कुछ समय बाद ही खत्म भी हो जाता है। हम कागजी ही नहीं घर के एक-मिनटी शेर हैं। हमारे शहरों की भीड़ को देखकर कई बार प्रश्न उठता है कि हम किस तरह जीने के लिए पैदा हुए हैं? फिर भी हमें कुछ भी कहने का हक नहीं क्योंकि हमें हर काल में ऐसा न करने के लिए न जाने किस-किस तरह से गुमराह किया गया है। 
हमें विचारधाराओं से, शब्दों से, जीवनशैली से, सोचने की क्षमता से, इस तरह नियंत्रित कर दिया गया है कि हम अपना हित भी नहीं सोच पाते। हम वैचारिक रूप से पूरी तरह खोखले और सांस्कृतिक रूप से पंगु बन चुके हैं। जहां प्रजातंत्र के नाम पर शब्दों के साथ खेलते हुए हम रोज बेवकूफ बनाये जाते हैं, पग-पग प्रताड़ित होते हैं। हमें एक जागरूक और सफल प्रजातंत्र कहा जाता है और जनता की वाहवाही की जाती है। जबकि यह एक कुटिल शब्दों के साथ खेलने के समान है। असल में हमें जो शासक मिलते हैं उसके लिए हम ही जिम्मेवार हैं। उस देश का क्या हो सकता है जिस देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने पांच साल का राजनीतिक अधिकार मात्र चंद नोटों या शराब की बोतल या फिर धर्म-जाति के नाम पर डालकर किसी एक ऐसे व्यक्ति को सौंप देता है जो बाद में हमारा शोषण करना जानता है। उसे इस बात का अहसास नहीं कि अगर वो ढंग से राजनीतिक कर्तव्य का पालन करे तो उसका सामाजिक जीवन सम्मानपूर्वक हो सकता है। मगर उस संस्कृति का क्या किया जाये जो सिर्फ वर्तमान में जीती है। पहले बाहर के लोग हमें बांटकर हमारे ऊपर अपना वर्चस्व बनाये रखते थे अब हमारे अपने ही हमें रोज बांटते रहते हैं और हम समझ नहीं पाते। हमें इतना कमजोर कर दिया गया है कि हमारे सारे नैसर्गिक अधिकारों को पहले छीन लिया जाता है, हमें फटेहाल भूख से तड़पाया जाता है और फिर चंद टुकड़ों को डालकर हम पर दया दिखाई जाती है। और यह अहसास कराया जाता है कि आपके लिए कितना कुछ करने के लिए व्यवस्था आतुर है। मगर इसके लिए कौन दोषी हैं? हम स्वयं। सच तो यह है कि महाभारत में भी पांडवों को आत्मसम्मान और अधिकार के लिए लड़ना पड़ा था, नहीं तो सदियों तक दुर्योधन के अत्याचार को भोगना पड़ता। गुलाम रहना पड़ता। राम को भी रावण से युद्ध करना पड़ा था। राक्षसी प्रवृत्तियां समर्पण की भाषा नहीं जानती। आधुनिक युग में रावण के मायावी रूप में फंसना हमारी कमजोरी ही प्रदर्शित करता है। 
यह लेख मनोज सिंह द्वारा लिखा गया है.मनोजसिंह ,कवि ,कहानीकार ,उपन्यासकार एवं स्तंभकार के रूप में प्रसिद्ध है .आपकी'चंद्रिकोत्त्सव ,बंधन ,कशमकश और 'व्यक्तित्व का प्रभावआदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है.

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कंजूस राजा / बाल कहानियाँ

कंजूस राजा
चन्द्रपुर का राजा अपने कंजूस स्वभाव के नाम से जाना जाता था। वह मजदूरों से काम करवाता, किसानों से अनाज लेता, सुनारों से आभूषण बनवाता पर पैसा देते वक्त कुछ भी मनगढ़ंत किस्सा बनाकर उन्हें खाली हाथ भिजवा देता। लोग चुप रहते। आखिर राजा से कौन बहस करता। फिर भी राजा के इस आचरण से त्रसित होकर सुनार नकली आभूषण देने लगे और व्यापारी मिलावटी माल व किसान खराब अनाज राजा के पास पहुँचाने लगे। खराब अनाज व मिलावटी चीजों के सेवन से राजा की तबीयत खराब रहने लगी। वह बिस्तर से लग गया। राजा ने मंत्री से कहकर देवशर्मा नामक वैध को बुलवाया। राजा की सेहत का सवाल था, इसलिये देवशर्मा ने महंगी जड़ी-बूटी लेकर दवा बनाई और राजा को दी। राजा की तबीयत एकदम ठीक हो गई।
परन्तु जब वैध को पैसे देने की बात आयी तो राजा ने कहा, ‘ वैधजी, कल सपने में मेरे पिताश्री ने बताया कि तुम्हारे पिता उनके खास वैध थे और उन्होंने खुश होकर तुम्हारे पिता को पेशगी बतौर बहुत सारा पैसा दिया था और कहा था कि वे अपने बेटे को भी वैध बनाये ताकि वह भी उनकी तरह मेरे पिताश्री के बेटे याने मेरी चिकित्सा अच्छे से करे। सो तो तुम कर ही रहे हो और इस काम का पैसा तुम्हारे पिता मेरे पिता से पहले ही पेशगी बतौर ले चुके हैं।’
भूपेन्द्र कुमार दवे
यह सुन देवशर्मा चुप रहा और खाली हाथ घर लौट आया। कुछ दिनों बाद राजा की तबीयत फिर बिगड़ी और देवशर्मा को पुनः बुलवाया गया। देवशर्मा इस समय सतर्क था। उसने राजा से कहा, ‘राजन्! कल ही मुझे सपने में मेरे पिताजी ने बताया कि वे आपके पिताश्री का बहुत सम्मान करते थे। पेशगी बतौर पैसे पाकर मेरे पिताजी ने आपके पिताश्री से कहा, ‘पता नहीं कि मेरा बेटा मेरे जैसा अच्छा वैध बन पावेगा या नहीं। इसलिये हे राजन्, आपने जो पैसे दिये हैं उससे मैने बहुत ही कीमती और बढ़िया बवा बनाई है जिसे आप ले लेंगे तो आपका बेटा कभी बीमार पड़ेगा ही नहीं और बीमार हुआ भी तो अपने आप ठीक हो जावेगा।’
  वह दवा आपके पिताश्री ने ले ली थी। अतः आप निष्चिंत रहें। आप की तबीयत अपने आप ठीक हो जावेगी।’
यह बात सुन राजा की आँखें खुल गयी और उसका कंजूसी रफूचक्कर हो गई।

 यह रचना भूपेंद्र कुमार दवे जी द्वारा लिखी गयी है. आप मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल से सम्बद्ध रहे हैं . आपकी कुछ कहानियाँ व कवितायें आकाशवाणी से भी प्रसारित हो चुकी है . 'बंद दरवाजे और अन्य कहानियाँ' ,'बूंद- बूंद  आँसू' आदि आपकी प्रकाशित कृतियाँ है .
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नारी / माधवी त्रिपाठी की कविता

नारी 
नारी ही अभागन क्यों ?
समझ नहीं पाती हूँ ,
उत्तर की कोशिश में मैं
केवल भटकती रह जाती हूँ
माँ बहन ,बेटी का सदैव ,
रूप धर कर वह आती है ,
सबका पालन पोषण करके -
स्वयं तृप्त हो जाती है ,
संतान का दुःख है उसका अपना ,
उनकी ख़ुशी में वह खुश रहती है ,
आत्मा हो जाए चाहे तार  तार
पर हरदम हँसती रहती है .
हर त्याग उसका है अलौकिक,
हर छटा उनकी  निराली है .
त्याग के बदले पाती है दुःख ,
यह नारी की अमिट कहानी है .


यह रचना माधवी त्रिपाठी जी द्वारा लिखी गयी है .उनकी यह कविता उनके काव्य - संग्रह 'इन्द्रधनुष' से लिया गया है.माधवी जी,कलकत्ता में अध्यापिका के रूप में कार्यरत है. आकाशवाणी के युववाणी कार्यक्रम में आपकी कई कविताओं  का  सफलतापूर्वक प्रसारण हुआ है  तथा कलकत्ता के प्रसिद्ध समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में आपके विविध लेखों और रचनाओं का समय - समय पर प्रकाशन होता रहता है .

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