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राजभाषा हिंदी के प्रचार प्रसार में कम्प्यूटर का योगदान

राजभाषा हिंदी के प्रचार प्रसार में कम्प्यूटर का योगदान

राजभाषा (हिंदी) समाहित कम्प्यूटर, लोगों के स्वाभिमान को सवाँरने में काफी सहयोगी हुआ है. अपनी भाषा में काम करना एक अलग ही खुशी देता है.

राजभाषा वाले संगणक से हिंदी जानने वाले बहुत लोंगों  को उनके बहुत से सवालों का जवाब मिल गया. उनके लिए हिंदी में कंप्यूटर पर काम करना बहुत ही आसान हो गया. साथ ही बहुतों के बहुत सारे बहाने छूट गए. फिर शुरु करना पड़ेगा या टाईप करना सीखना पड़ेगा – सब धरे रह गए. हिंदी प्रेरको का नारा - आप शुरु तो कीजिए, सीख जाएंगे – सामने आ गया. सही नारा है, यदि आप हिंदी लिख पढ़ लेते हैं और कोशिश करने से परहेज नहीं करते, तो हिंदी टाईपिंग के लिए हाथ साफ करने में आपको एक सप्ताह और ज्यादा से ज्यादा एक पखवाड़ा लगेगा. अब रफ्तार की बात करेंगे, तो निर्भर करेगा कि आप कितना अनुभव प्राप्त कर पाते हैं. राजभाषा विभागों ने कई जरूरी वाक्याँशों व टिप्पणियों को संगणक में सँजो रखा है. कॉपी-पेस्ट समेत समस्त संगणक (कम्प्यूटर) तकनीक राजभाषा के साथ है.

राजभाषा के पैकेज आकृति, अक्षर, लीप कुछ ज्यादा चले. आप जिस भारतीय भाषा को लिख – पढ़ - बोल लेते हो, लीप-ऑफिस पेकेज में उसी में टाईप करो और फिर चुनकर किसी भारतीय भाषा में बदल लो. इस ध्वनि-आधारित पैकेज में भाषा बदलने पर उच्चारण नहीं, केवल लिपि बदलती है. जहाँ कुछ भी नहीं हो पा रहा था, वहाँ यह बहुत बड़ी सुविधा है ? एक ही पन्ने पर आप कई भाषाएँ लिख सकते हैं. लीप ऑफिस सबसे शक्तिशाली हिंदी पैकेज है. नीचे एक उदाहरण देखिए.

অনূপ কুমার বোললো - मैं picture  में  देखा –  నాకు తేలుగు రాదు -  ਅਸਿ ਭਾਂਗਡਾ ਪਾ ਨਹੀੰ ਸਕਤੇ ਸੀਗੇ.

इस ऊपरी वाक्य में बंगला, हिंदी, अंग्रेजी, तेलुगु एवं पंजाबी भाषाएं लिखी गई हैं.

संगणक में राजभाषा लिखने के बहुत तरीके हैं. हिंदी की-बोर्ड से कतराने वाले फोनेटिक ट्रान्सलिटेरेशन अपनाएं. टाईप अंग्रेजी में और पटल पर देवनागरी लिपि - यह बहुत सुविधाजनक व सरल है. Ekalam.raftaar.in से आप आसानी से ट्राँसलिटेरेशन (लिप्यंतरण) की जानकारी पा सकते हैं.  IME Indic पैकेज में तो ड्रॉपड्राऊन मीनू झलक जाते हैं. आपको चयन भर करना है कि आपको कौन सा अक्षर या शब्द समुच्चय चाहिए. विस्तृत जानकारी के लिए नीचे के लिंक पर क्लिक करें.


यदि लिंक पढ़े नहीं जा रहे हों तो इस लिंक पर बहुत सारे लिंकमिल जाएँगे.


राजभाषा विकास परिषद के ब्लॉग पर भी इसकी सूचना है. पर लिंक यहाँ लगाने के लिए जो संदेश भेजा था, उसका अभी तक कोई जवाब नहीं मिला इसलिए नहीं लगा पा रहा हूँ.

समय समय पर हिंदी के पेकेज बदलते रहने की वजह से कुछ परेशानियाँ हुई. लेकिन साथ ही साथ कुछ ही समय में परेशानी को दूर करने के तरीके भी सामने आ गए. जरूरत ने नए - नए आविष्कारों को जन्म दिया. सबसे बड़ी परेशानी रही - पुराने फॉँट नए पेकेज में या तो चलते ही नहीं थे या फिर गलत - सलत पढ़े जाते थे. आज भी ऐसे पेकेज हैं जिसमें लिखने पर अक्षरों के पहले लगने वाली मात्राएं अक्षरों के बाद दिखती और छपती हैं. कुछ फाँट तो नए पेकेज में पढ़े ही नहीं जाते और वहाँ कुछ अजीब से चिन्ह (आस्की) नजराते हैं.

हाल ही में ekalam.Raftaar.in में फाँट बदलने की सुविधा आ गई है. इससे सारे पुराने फाँट की रचनाएं या रिकार्ड नए फाँट में बदले जा सकते हैं. इसमें कुछ सीमा तक सेवा निशुलक है - प्रतिदिन करीब हजार शब्दों का फाँट मुफ्त में बदला जा सकता है. उसके बाद खर्च करने से प्रतिदिन 5000 या उससे अधिक शब्दों के फाँट बदलने का भी प्रावधान है. ऐसी बहुत सी आवश्यक सुविधाओं ने हिंदी में काम करने को अत्यंत आसान बना दिया है. गूगल पर ऐसे और पोर्टल खोजे जा सकते हैं

एम एस ऑफिस के नए पैकेजों में हिंदी कंप्यूटरों के साथ आ रही है. कम्प्यूटर पर हिंदी (राजभाषा) के लिए यूनिकोड की मात्र एक ही लिपि मंगल पर सरकार की मोहर है. अभी यूनिकोड में हिंदी के बहुत कम फाँट हैं. हिंदी वालों को इस पर ध्यान देते हुए कुछ और फाँट विकसित करवाने चाहिए. कंप्यूटर के – इनस्किप्ट - की बोर्ड पर हिंदी आसानी से टाईप किया जा सकता है. वैसे पुराने टाईपराईटरों के की बोर्ड भी कहीं कहीं प्रयोग में लाए जाते हैं. जो लोग टाईपराईटर पर काम करते थे उनके लिए यह सुविधाजनक है. इनस्क्रिप्ट में की स्ट्रोक्स कम लगते हैं, भाषा बदलने के लिए केवल चुनाव कर लीजिए - लिपि बदलती रहेगी – स्ट्रोक्स वही रहेंगे, तो उच्चारण भी वही रहेगा. बहुत अच्छी स्पीड से काम होता है. एक ही मंगल फॉंट में टाईप किया जाए तो अलग-अलग कार्यालयों में एडिटिंग की जा सकेगी, फिर टाईप नहीं करना पड़ेगा.

लीप ऑफिस जैसे पेकेज से एक और फायदा यह हुआ कि भारत की एक भाषा में आने वाले शब्दों के उच्चारण को लिखने के लिए दूसरी भाषा में भी नए वर्ण आ गए. जैसे दक्षिण भारतीय भाषाओं में ए व ऐ ( तथा  और औ ) के बीच की ध्वनियों के लिए हिंदी में विकल्प आ गए हैं किंतु अब तक उन्हें वर्णमाला में जगह नहीं मिली है.

करीब सभी सामाजिक पोर्टलों पर सुविधा के कारण राजभाषा में बहुत कुछ हो रहा है और भी होगा. हिंदी के पोर्टल, ई-पत्रिकाएं, किताब और ब्लॉग्स खुले हैं. जो कुछ कभी अंग्रेजी में ही होता था, अब हिंदी में भी (साथ ही सभी भारतीय भाषाओं में) हो सकता है और हो भी रहा है. इन सबके बावजूद भी आज हिंदी में स्पेल-चेक व सॉर्टिंग की सुविधा नहीं है. इसकी कमी को पूरा करने के लिए शायद कुछ और वक्त लगेगा.

रंगराज अयंगर
संगणकों में राजभाषा की सुविधा से बार बार की टाईपिंग बंद हो गई. केवल परिवर्तन मात्र फिर करने पड़ते हैं. संप्रेषण (मास कम्यूनिकेशंस) की बहुत बड़ी सुविधा उपलब्ध हो गई है, जिससे कम समय में काम और निर्णय हो पाते हैं. लोग एक ही मिसिल पर बिना कागजात भेजे काम कर पाते हैं. कागज की बचत होती है और पर्यावरण सुधरता है. पुराने सुरक्षित रिकार्ड तुरंत उपलब्ध हो जाते हैं और बार-बार प्रिंट किया जा सकता है. यहाँ तक कि इन संप्रेषण सुविधाओं के कारण मैं एक शहर में बैठकर लिखा चिट्ठा अपने महकमे के किसी दूसरे शहर के कंप्यूटर विशिष्ट पर छाप सकता हूं ताकि उस व्यक्ति को यह तुरंत प्राप्त हो जाए.

हो सकता है कुछ समय बाद यह सुविधा इंटरनेट पर भी आ जाए कि ईमेल भेजने की तरह आप कोई पत्र मुझे बताकर मेरे प्रिंटर पर सीधा भेज दें जिसे हस्ताक्षर कर मैं उचित जगह जमा कर सकूँ. कम समय  में ही ऐसी सुविधाएं मिलने लगेंगी. अब हिंदी में काम करने वाले भी ऐसी सुविधाओं का फायदा ले सकेंगे.

जैसे अतर्राष्ट्रीय संगठनों में ऐसे अनुवादक मशीने लगाई जाती हैं जिसमें बोलने वाला अपनी भाषा में बोलता है और सुनने वाला उसे अपनी भाषा में सुनता है. इसी तरह ऐसी कंप्यूटर की भी भविष्य में कल्पना की जा सकती है कि मैं यहाँ से हिंदी मे लिख कर एक पत्र प्रेषित करूं और उसे चाईना में मंडारिन भाषा में देखा या छापा जा सके. मैं एक हिंदी पत्र का प्रिंट अपने कार्यालय से देता हूँ जो पोलेंड के किसी कार्यालय में उनकी भाषा में छापा जा सकेगा. इस तरह की सुविधाएं सारे विश्व को संपन्न करेंगी

सर्वोत्तम उपलब्धि है कि आज अंग्रेजी नहीं जानने वाले भी मुख्य धारा में समाहित होकर अपना सहयोग दे पा रहे हैं. सारा इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम राजभाषा के लिए भी उपलब्ध है.  सारे रास्ते खुल गए हैं. सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं. कईयों ने अपनाया भी है. इसके कारण लोग कम्प्यूटर चलाना सीख रहे हैं.

इन सुविधाओं का लाभ उठाकर यदि अपने देश की भाषाओं और विदेशी भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान को हिंदी में उपलब्ध कराने का कोई ठोस प्रयास सरकार करे या करने वालों को सहारा दे, तो हिंदी की प्रगति कई गुना बढ़ जाएगी और हिंदी राष्ट्रभाषा ही नहीं विश्व भाषा बनने के ख्वाब भी बखूबी देख सकेगी . लेकिन इसके लिए बहुमुखी व बहु-आयामी प्रयास और सहयता की बहुत जरूरत होगी.

अब हम पर निर्भर है कि इसका कितना सदुपयोग करते हैं.

यह रचना माड़भूषि रंगराज अयंगर जी द्वारा लिखी गयी है . आप इंडियन ऑइल कार्पोरेशन में कार्यरत है . आप स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य में रत है . आप की विभिन्न रचनाओं का प्रकाशन पत्र -पत्रिकाओं में होता रहता है . संपर्क सूत्र - एम.आर.अयंगर. , इंडियन ऑयल कार्पोरेशन लिमिटेड,जमनीपाली, कोरबा. मों. 08462021340


कह दो कह दो अपना ग़म

कवि सुधेश की गज़लें 
(1)
दुनिया को देखता हूँ बड़ी हसरतों के साथ
सुधेश

महरूमियों की दास्ताँ हूँ मुसर्रतों के साथ.
कब की गुज़ार दी है अपनी ज़िन्दगी
फिर भी तो ज़िन्दा हूँ कई ज़रूरतों के साथ.
हसरत निकल गई है मुझ को रुला रुला
फिर भी दिल धड़कता कई हसरतों के साथ.
निर्मम है ज़माना तो नहीं कुछ हुआ करे
रिश्ता न तोड़ पाया मगर मुहब्बतों के साथ.
सब से ही चाहतों की तमन्ना हुए लिये
फिर क्यों निबाह करता रहा नफ़रतों के साथ.
(2)
कह दो कह दो अपना ग़म
कहने से होगा कुछ कम.

दुनिया कितनी निर्मम है
कह देती दो आँखें नम.
जितना दुख उतना मधु स्वर
श्रोता ख़ुश ज़्यादा या कम.
माना ख़ुश पर कहते क्यों
जल कर कुछ होंगे बेदम.
जितना रोना उतना रो
हँस लेना लेकिन कम कम.
जीते जी गाली देते
मरने पर करते मातम.
जीवन काली रजनी है
पखवाड़े में इक पूनम.
ख़ुश हो लें पर सब के सँग
ग़म आये चुप सह लें ग़म.
(3)
मेरे शुभचिन्तक मुझे भरमा रहे हैं
मगर दुश्मन देखिये कतरा रहे हैं.
बड़प्पन तो टिका बैसाखियों पर
मगर उन पर टिके इतरा रहे हैं.
एक कर डाला ज़मीनो आसमां को
मगर इनआम लेते हुए शरमा रहे हैं.
इमरजैन्सी में बजाई चैन की वंशी
वक़्त बदला अब वही घबरा रहे है.
चुनिन्दा गालियाँ जो बक रहे थे
दुश्मनों को सभ्यता सिखला रहे हैं.
देश का ठेका लिया था पीढ़ियों तक
ठेकेदारी ख़त्म तो हकला रहे हैं.
(4)
खाना पीना है कुछ पल भर
उस के ख़ातिर खटना दिन भर.
भूले भटके हँस लेता हूँ
लेकिन रोना है जीवन भर.
जैसे कल की सारी बातें
इत्ते क़िस्से सुन कारीगर.
आख़र पढ़ते आँखें फूटीं
जो अनपढ़ हैं दीदावर.
लिखते मेरी क़लमें टूटीं
पर वे लेखक हैं पेशेवर.
धावक को बस धकिया कर के
लँगड़े बैठे हैं चोटी पर.
मैं कुछ आख़र लिख लेता हूँ
कवि पर वे ऊँचे आसन पर.

- सुधेश



यह रचना डॉ.सुधेश जी द्वारा लिखी गयी है . आपकी, फिर सुबह होगी ही, घटनाहीनता के विरुद्ध, तेज़ धूप, जिये गये शब्द, गीतायन, बरगद (खण्डकाव्य), निर्वासन (खण्ड काव्य), जलती शाम, हादसों के समुन्दर (ग़ज़लसंग़ह) आदि प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ हैं. आपको, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी का भारतीय कविता पुरस्कार 2006, भारत सरकार के सूचना प़सारण मंत्रालय का भारतेन्दु हरिश्चन्द़ पुरस्कार 2000, लखनऊ के राष्ट़़धर्म प़काशन का राष्ट़़धर्म गौरव सम्मान 2004, आगरा की नागरी प़चारिणी सभा द्वारा सार्वजनिक अभिनन्दन 2004 आदि से सम्मानित किया गया है.
संपर्क सूत्र - सुधेश, 314 सरल अपार्टमैन्ट्स, द्वारिका, सैक्टर 10 दिल्ली 110075

साहित्य मंथन सृजन पुरस्कार

डॉ. जोराम यालाम नाबाम को प्रथम साहित्य मंथन सृजन पुरस्कार प्रदत्त
हैदराबाद, 18 नवंबर 2014 (प्रेस विज्ञप्ति)।
मेरी माँ कहती थी कि चमत्कार पर विश्वास मत करो बल्कि चमत्कार को देखना सीखोआज मेरी माँ मुझे याद आ रही है क्योंकि हैदराबाद के इस सभागार में मेरे लिए चमत्कार हो रहा हैमुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि प्रेम के इस शहर में मुझे इतने महत्वपूर्ण पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा हैमेरे पास शब्द नहीं है कि इस खुशी को अभिव्यक्त कर सकूँबस महसूस कर रही हूँमुझे लग रहा है कि 'साहित्य मंथन' ने मुझ पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी डाल दी है कि मैं लगातार अधिक से अधिक लिखती रहूँ'
ये उद्गार अरुणाचल प्रदेश की पहली हिंदी कथाकार डॉ.जोराम यालाम नाबाम ने 'साहित्य मंथन' के तत्वावधान में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के खैरताबाद स्थित सम्मेलन कक्ष में संपन्न सम्मान समारोह में प्रथम 'साहित्य मंथन सृजन पुरस्कार' ग्रहण करते हुए प्रकट किएयह पुरस्कार उन्हें वर्ष 2013 में प्रकाशित उनकी कथाकृति 'साक्षी है पीपल' पर प्रदान किया गया

समारोह में उपस्थित सभी साहित्यप्रेमी उस समय अभिभूत हो उठे जब डॉयालाम ने अपने वक्तव्य का समापन करते हुए कहा कि 'मैं अपने हृदय की पूरी श्रद्धा के साथ यह पुरस्कार शिरोधार्य करते हुए पूर्ण पवित्रता का अनुभव कर रही हूँ।' आज जब साहित्यिक पुरस्कारों को लेकर पुरस्कारदाता संस्था और पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं के मन में केवल लेन- देन की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है वहाँ जोराम यालाम नाबाम द्वारा पुरस्कार की स्वीकृति का यह भाव एक नई आश्वस्ति को जन्म देता है
उल्लेखनीय है कि 'साहित्य मंथन सृजन पुरस्कार' का प्रवर्तन पंचतुर्देव शास्त्री की स्मृति में इसी वर्ष किया गया हैसंस्था की अध्यक्ष डॉपूर्णिमा शर्मा ने बताया कि यह पुरस्कार प्रति वर्ष साहित्य, समाजविज्ञान और संस्कृति संबंधी प्रकाशित कृति पर एक-एक वर्ष के क्रम में प्रदान किया जाएगा। पुरस्कार के अंतर्गत 11,000 रुपए की सम्मान राशि, प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिह्न, शाल, श्रीफल और लेखन सामग्री सम्मिलित हैं

डॉयालाम को पुरस्कार प्रदान करते हुए 'नानीलु' के प्रवर्तक और साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत प्रतिष्ठित तेलुगु कवि प्रोएनगोपि ने कहा कि यह मात्र डॉयालाम का ही सम्मान नहीं बल्कि पूर्वोत्तर की हिंदी रचनाशीलता का सम्मान हैउन्होंने ध्यान दिलाया कि हिंदी ही भारत को अखंड बनाने वाली भाषा हैयालाम की कहानियों में मुखरित स्त्री वेदना को उन्होंने अरुणाचल प्रदेश के जनजातीय परिवेश का सच बताया
विश्वप्रसिद्ध कला संग्राहक पद्मश्री जगदीश मित्तल ने दीप प्रज्वलन करके कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन करते हुए कहा कि डॉयालाम को सम्मानित कर 'साहित्य मंथन' ने एक अनूठी पहल की हैयह सिलसिला बना रहना चाहिए

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पधारे प्रोदेवराज ने अपने वक्तव्य में अरुणाचल सहित समस्त पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक विरासत और पौराणिक कथाओं का उल्लेख करते हुए आह्वान किया कि उस समस्त अलिखित संपदा को हिंदी के माध्यम से देश और दुनिया के सामने लाया जाना चाहिएइस दिशा में पुरस्कृत लेखिका के प्रयासों की उन्होंने मुक्त कंठ से सराहना की
समारोह की अध्यक्षता करते हुए अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोएमवेकटेश्वर ने कहा कि अरुणाचल में जीवन को रोज एक नई चुनौती का सामना करना पड़ता हैऐसे में वहाँ की स्त्रियाँ अपने अदम्य साहस के बल पर विषम परिस्थितियों से दो-दो हाथ करती हैं तथा डॉ। यालाम के कहानी सग्रह 'साक्षी है पीपल' में अरुणाचल की जनजातियों की इसी स्त्री का दर्द अभिव्यक्त हुआ है
इस अवसर पर अरुणाचल प्रदेश के पौराणिक आख्यानों पर आधारित डॉजोराम यालाम नाबाम की हिंदी पुस्तक 'तानी मोमेन' (पुरखों की लीलास्थली) के विवेक नाबाम द्वारा किए गए अंग्रेजी अनुवाद को भी डॉएमवेंकटेश्वर ने लोकार्पित किया
समारोह का संचालन डॉजीनीरजा ने किया तथा 'साहित्य मंथन' के संस्थापक डॉऋषभदेव शर्मा ने आभार प्रकट किया

चित्र परिचय:
  •     'साहित्य मंथन सृजन पुरस्कार' ग्रहण करते हुए अरुणाचल प्रदेश की हिंदी लेखिका डॉजोराम यालाम नाबामसाथ में - प्रोएनगोपि, पद्मश्री जगदीश मित्तल, प्रोएमवेंकटेश्वर और विवेक नाबाम
  •      डॉजोराम यालाम नाबाम की पुस्तक के अंग्रेजी अनुवाद 'तानी मोमेन' का लोकार्पण करते हुए प्रोएमवेंकटेश्वरसाथ में - प्रोदेवराज, प्रोएनगोपि, पद्मश्री जगदीश मित्तल, अनुवादक विवेक नाबाम, लेखिका डॉजोराम यालाम नाबाम, डॉगुर्रमकोंडा नीरजा और प्रोऋषभदेव शर्मा

प्रस्तुति: डॉगुर्रमकोंडा नीरजा
सह-संपादक 'स्रवंति'
प्राध्यापक
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा
खैरताबाद, हैदराबाद - 500 004
मोबाइल - 09849986346
ईमेल - neerajagkonda@gmail.com

आपका बंटी उपन्यास

दम तोड़ती रिश्ते के बीच की उलझी हुई डोर की कहानी 'आपका बंटी'
पुस्तक  - आपका बंटी
लेखिका - मन्नू भंडारी
आपका बंटी मन्नू भंडारी के उन बेजोड़ उपन्यासों में है जिनके बिना न बीसवीं शताब्दी के हिन्दी उपन्यास की बात की जा सकती है, न स्त्री-विमर्श को सही धरातल पर समझा जा सकता है। दजर्नों संस्करण और अनुवादों का यह सिलसिला आज भी वैसा ही है जैसा धमर्युग में पहली बार धारावाहिक के रूप में प्रकाशन के दौरान थाबच्चे की निगाहों और घायल होती संवेदना की निगाहों से देखी गई परिवार की यह दुनिया एक भयावह दु: स्वप्न बन जाती हैकहना मुश्किल है कि यह कहानी बालक बंटी की है या माँ शकुन की और अजय-शकुन के बिखरे रिश्ते की। सभी तो एक-दूसरे में ऐसे उलझे हैं कि त्रासदी सभी की यातना बन जाती है। शकुन के जीवन का सत्य है कि स्त्री की जायज महत्वाकांक्षा और आत्मनिर्भरता पुरुष के लिए चुनौती है-नतीजे में दाम्पत्य तनाव से उसे अलगाव तक ला छोड़ता है। यह शकुन का नहीं, समाज में निरन्तर अपनी जगह बनाती, फैलाती और अपना कद बढ़ाती हर स्त्री का हैपति-पत्नी के इस द्वन्द में यहाँ भी वही सबसे अधिक पीसा जाता है जो नितान्त निर्दोष, निरीह और असुरक्षित है-बंटी। बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ-बूझ के लिए चर्चित, प्रशंसित इस उपन्यास का हर पृष्ठ ही मर्मस्पर्शी और विचारोत्तेजक हैहिन्दी उपन्यास की एक मूल्यवान उपलब्धि के रूप में आपका बंटी एक कालजयी उपन्यास है
मंन्नु भंडारी का वक्तव्य
उपन्यास के प्रारंभ में लेखिका का वक्तव्य अत्यंत ही मर्मस्पर्शी है उसके कुछ अंश इस प्रकार हैं-वह बांकुरा की एक साँझ थी। अचानक ही पीका फोन आया- तुमसे कुछ बहुत जरूरी बात करनी है, जैसे भी हो आज शाम को ही मिलो, बांकुरा मेंमैं उस जरूरी बात से कुछ परिचित भी थी और चिंतित भीरेस्त्राँ की भीनी रोशनी में मेज पर आमने-सामने बैठकर, परेशान और बदहवास पीने कहा- समस्या बंटी की हैतुम्हें शायद मालूम हो कि बंटी की माँ (पी। की पहली पत्नी) ने शादी कर लीमैं बिलकुल नहीं चाहता कि अब वह वहाँ एक अवांछनीय तत्त्व बनकर रहे, इसलिए तय किया है कि बंटी को मैं अपने पास ले आऊँगाअब से वह यहीं रहेगा और फिर वे देर तक यह बताते रहे कि बंटी से उन्हें कितना लगाव है, और इस नई व्यवस्था में वहाँ रहने से उसकी स्थिति क्या हो जाएगी.यहां एक ऐसे बच्ची की स्थिति की वर्णना है जो अपने माता-पिता के टूटे हुए रिश्ते के बीच एक मात्र कड़ी है
बंटी जैसे बच्चों की दशा का वर्णन
लेखिका ने बंटी जैसे बच्चों की दशा का कुछ इस तरह से वर्णन किया है कि -बंटी अपनी नई माँ के घर आ गया हैनई माँ और पिता के बीच एक बालिकालगभग छ: महीने बाद की घटना हैड्राइंग रूम में अनेक बच्चे धमा-चौकड़ी मचाए हैं-उन्मुक्त और निश्चिंत। बारी-बारी से सब सोफे पर चढ़कर नीचे छलाँग लगा रहे हैं। उस बच्ची का नंबर आता हैसोफे पर चढ़ने से पहले वह अपनी नई माँ की ओर देखती हैमाँ शायद उसकी ओर देख भी नहीं रही थी, पर उन अनदेखी नजरों में भी जाने ऐसा क्या था कि सोफे पर चढ़ने के लिए बच्ची का ऊपर उठा हुआ पैर वापस नीचे आ जाता हैबच्ची सहमकर पीछे हट जाती हैअनायास ही मेरे भीतर छ: महीने पहले का बंटी उस वातावरण में व्याप्त एक सहमेपन के रूप में जाग उठता हैखेल उसी तरह चल निकला है, लेकिन अगर कोई इस सारे प्रवाह से अलग हटकर सहमा हुआ कोने में खड़ा है, तो वह है बंटीरात में सोई तो लगा छ: महीने पहले जिस बंटी को अपने साथ लाई थी, वह सिर्फ़ एक दयनीय मुरझायापन बनकर रह गया हैलेखिका बंटी के संदर्भ में कहती हैं कि किसी एक व्यक्ति के साथ घटी घटना दया, करूणा और भावुकता पैदा कर सकती है, लेकिन जब अनेक जि Þ ंदगियाँ एक जैसे साँचे में ही सामने आने लगती हैं तो दया और भावुकता के स्थान पर मन में धीरे-धीरे एक आतंक उभरने लगता हैबंटी के इन अलग-अलग टुकड़ों ने उस समय मुझे करुणा-विगलित और उच्छ्वसित ही किया था, लेकिन जब सब मिलाकर बंटी मेरे सामने खड़ा हुआ तो मैंने अपने-आपको आतंकित ही अधिक पाया, समाज की दिनों-दिन बढ़ती हुई एक ऐसी समस्या के रूप से, जिसका कहीं कोई हल नहीं दिखाई देतायही कारण है कि बंटी मुझे तूफानी समुद्र-यात्रा में किसी द्वीप पर छूटे हुए अकेले और असहाय बच्चे की तरह नहीं वरन अपनी यात्रा के कारणों के साथ और समानांतर जीते हुए दिखाई दिया। भावना के स्तर पर उद्वेलित और विगलित करनेवाला बंटी जब मेरे सामने एक भयावह सामाजिक समस्या के रूप में आया तो मेरी दृष्टि अनायास ही उसे जन्म देने, बनाने या बिगाड़नेवाले सारे सूत्रों, स्रोतों और संदर्भों की खोज और विश्लेषण की ओर दौड़ पड़ीबंटी के तत्काल संदर्भ अजय और शकुन हैं.दूसरे शब्दों में वे संदर्भ अजय और शकुन के वैवाहिक संबंधों का अध्ययन और उसकी परिणति के रूप में ही मेरे सामने आएइस पूरी स्थिति की सबसे बड़ी विडंबना ही यह है कि इन संबंधों के लिए सबसे कम जि Þ म्मेदार और सब ओर से बेगुनाह बंटी ही त्रास को सबसे अधिक भोगता है इस ट्रैजडी केलेखिका ने बंटी को उन तमाम बच्चों का प्रतिनिधि बनाया जो कि अक्सर पति-पत्नी के रिश्ते के बीच बेटी या बेटा बन कर पिसते हैं।
महिला के दो रूपों का वर्णन
लेखिका ने मां और कामकाजी महिला के बीच की टकराहट को बड़ी ही अनोखी तरह से पेशकश की हैलेखिका ने कुछ इस तरह बयां किया है कि बंटी जानता है, ममी अब पीछे मुड़कर नहीं देखेंगीनपे-तुले क़दम रखती हुई सीधी चलती चली जाएँगी। जैसे ही अपने कमरे के सामने पहुँचेंगी चपरासी सलाम ठोंकता हुआ दौड़ेगा और चिक उठाएगाममी अंदर घुसेंगी और एक बड़ी-सी मेज के पीछे रखी कुर्सी पर बैठ जाएँगी। मेज पर ढेर सारी चिट्ठियाँ होंगीफाइलें होगीउस समय तक ममी एकदम बदल चुकी होंगीकम से कम बंटी को उस कुर्सी पर बैठी ममी कभी अच्छी नहीं लगींपहले जब कभी उसकी छुट्टी होती और ममी की नहीं होती, ममी उसे भी अपने साथ कॉलेज ले जाया करती थींचपरासी उसे देखते ही गोद में उठाने लगता तो वह हाथ झटक देताममी के कमरे के एक कोने में ही उसके लिए एक छोटी-सी मेज-कुर्सी लगवा दी जाती, जिस पर बैठकर वह ड्राइंग बनाया करताकमरे में कोई भी घुसता तो एक बार हँसी लपेटकर, आँखों ही आँखों में जरूर उसे दुलरा देतातब वह ममी की ओर देखतापर उस कुर्सी पर बैठकर ममी का चेहरा अजीब तरह से सख़्त हो जाया करता हैप्रंसिपल की कुर्सी पर बैठी ममी उसे कभी अच्छी नहीं लगतींवहाँ उसके और ममी के बीच में बहुत सारी चीजें आ जाती हैंममी का नक़ली चेहरा, कॉलेज, कॉलेज की बड़ी-सी बिल्डिंग, कॉलेज की ढेर सारी लड़कियाँ, कॉलेज के ढेर सारे काम! पर ममी है कि फूफी को कुछ नहीं कहतींबस, हँसती रहती हैं, क्योंकि उस समय घर में जो रहती हैं ममी! वह भी एकदम ममी बनी हुई
आपका बंटी उपन्यास पर इतिश्री सिंह के विचार
आपका बंटी एक ऐसी बच्चे की मनो: गाथा है जो अपनी मम्मी और पापा के रिश्तों की डोर है वह भी उलझा
इतिश्री सिंह
हुआ
मन्नु भंडारी ने जब यह उपन्यास लिखी शायद तब तलाक के उतने मामले न होते होंगे जितना की आज होता हैआज बात-बात पर रिश्तेटूट जाया करते हैं और दूसरी बार हो या फिर बार फिर से रिश्ते जुड़ते भी हैं लेकिन इन सबके बीच जिसकी जिंदगी सूनेपन की गठरी बन जाती है वह है बंटी यानि बंटी जैसे बच्चों को। लेखिका ने शायद इस समस्या को पहले ही भांप लिया हैलेखिका ने बंटी के माध्यम से उन तमाम बच्चों की मनोदशा जो कि माता-पिता के विखराब के बीच एक मात्र डोर हैं, अतुल्य वर्णना दी है जो कि आपको दूसरी बार कहानी पढ़ने से नहीं रोक पाएगा

यह समीक्षा इतिश्री सिंह राठौर जी द्वारा लिखी गयी है . वर्तमान में आप हिंदी दैनिक नवभारत के साथ जुड़ी हुई हैं. दैनिक हिंदी देशबंधु के लिए कईं लेख लिखे , इसके अलावा इतिश्री जी ने 50 भारतीय प्रख्यात व्यंग्य चित्रकर के तहत 50 कार्टूनिस्टों जीवनी पर लिखे लेखों का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद किया. इतिश्री अमीर खुसरों तथा मंटों की रचनाओं के काफी प्रभावित हैं.
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बाल मजदूरी एक अभिशाप

हमारे देश में अक्सर बाल मजदूरी के खिलाफ आवाज उठाया जाता है'अभी करनी है हमको पढ़ाई, मत करवाओ हमसे कमाई' जैसे नारे लगाए जाते हैंसरकार भी इसे रोकने के लिए नए-नए कदम उठा रही है। बावजूद इसके देश में बाल मजदूरों की संख्या बढ़ती जा रही हैलोग विकासशील देशों में हजारों बच्चे बहुत छोटी अवस्था से ही काम करना आरंभ कर देते हैंकभी-कभी उन्हें उनके मौलिक अधिकारों से वंचित कर जबरन भी कार्य में लगा दिया जाता है। आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में सबसे अधिक बाल श्रमिक भारत में ही हैंसंभवत: देश में कोई भी ऐसा व्यवसाय नहीं है जिसमें बाल श्रमिकों को न लगाया जाता होपरिणामस्वरूप बच्चे अपने स्वतंत्रा एवं अधिकार से वंचित रह जाते हैं खुशहाल बचपन केकई बच्चे अपने माता-पिता के साथ बिना मजदूरी के भी कार्य करते हैं, जिनका आंकड़ा भी उपलब्ध नहीं हैकुटीर उद्योगों में बच्चों की एक बड़ी संख्या कार्य कर रही है, जैसे- कालीन उद्योग, माचिस बनाना, बीड़ी, पीतल, हीरा, कांच, जरी और सिल्क उत्पादन, हथकरघा, कढ़ाई का कार्य, चमड़ा उद्योग, प्लास्टिक उत्पादन, चूड़ी बनाना, खेल के सामान बनाना तथा पटाखा फैक्ट्री या ईंट के भट्टों जैसे खतरनाक स्थानों परइस प्रकार शिक्षा, भोजन, पानी और घर के अभाव के साथ-साथ कार्यस्थल पर उनका भावनात्मक एवं यौन उत्पीड़न भी होता है, जिसके कारण उनका बचपन पूरी तरह बर्बाद हो जाता है और वयस्क होने पर इन बच्चों को खराब स्वास्थ्य और हीन भावना विरासत में मिलती हैइनमें से अधिकतर कार्य उनके स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं जिससे वे किसी न किसी रोग की चपेट में आ जाते हैं तथा आजीवन इसका परिणाम भुगतने जाते हैं पर विवश हो
बालश्रम का व्यापक विस्तार भारत के अनियमित क्षेत्रों की पहचान बन चुका हैभारत में काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय श्रम संघटन के एक आकलन के अनुसार यहां कम से कम 9 करोड़ बाल श्रमिक हैं, हालांकि कुछ गैर-सरकारी संस्थाएं बाल श्रमिकों की संख्या इससे अधिक बता रही हैं। इनके अनुसार बच्चे कृषि, पशुपालन, बागवानी और घरेलू कामों घरों में छिप कर कार्य करना में लगे हुए हैंउल्लेखनीय है कि ये सभी कार्य सरकारी श्रम निरीक्षकों और मीडिया की जांच की पहुंच से दूर होते हैं तथा इन सभी कार्यों के लिए बच्चों को न्यूनतम वेतन दिया जाता हैबालश्रम की परिभाषा बालश्रम का अर्थ उस कार्य से है, जिसमें कार्य करने वाला व्यक्ति कानून द्वारा निर्धारित आयु सीमा से कम होता हैइस प्रथा को कई देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने शोषित करने वाला माना हैयूनिसेफ बालश्रम को अलग तरह से परिभाषित करता है, उसके अनुसार एक बच्चा जो बालश्रम गतिविधियों में लिप्त है, यदि उसकी आयु 5 वर्ष से 11 वर्ष के बीच है तथा वह एक घंटा आर्थिक गतिविधियों या एक सप्ताह में 28 घंटे घरेलू कार्य करता है, अथवा 12 से 14 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों में यदि वह कम से कम 14 घंटे आर्थिक गतिविधियों में या एक सप्ताह में कम से कम 42 घंटे आर्थिक गतिविधियों में लिप्त रहता है तो उसे बाल मजदूर कहा जाएगाचैंकाने वाला तथ्य यह है कि भारत के कुल कार्यबल का 11 प्रतिशत बच्चे हैं, तथा प्रत्येक 10 श्रमिकों पर एक बच्चा हैमें भारत सरकार ने गुरुपाद्स्वामी कमेटी गठित की थी 1979 वर्ष इस मुद्दे की समीक्षा के लिएकमेटी ने कहा कि समाज में जब तक ग़्ारीबी है, बालश्रम का पूर्ण रूप से उच्छेद कठिन हैइस संदर्भ में कमेटी ने सिफारिश प्रस्तुत की कि खतरनाक कार्यों में बालश्रम पर रोक लगाई जाएयूनिसेफ के अनुसार 14 वर्ष तक सबसे अधिक बाल श्रमिक भारत में हैंआइएलओ की रिपोर्ट के अनुसार 60 प्रतिशत बच्चे कृषि कार्यों में लिप्त हैं
इतिश्री सिंह
भारत समेत लगभग सभी विकासशील देश और यहां तक कि विकसित देशों में भी बाल श्रम व्यापक रूप में देखने को मिल जाएगाचाय वाले की दुकान हो या कोई होटल, छोटे-छोटे कई जोड़ी हाथ काम करते हुए मिल जाएंगे, जिनकी मासूम आंखें यही प्रश्न पूछती नजर आती है कि उनका बचपन कहां खो गया है? उनमें और दूसरे बच्चों में क्या अंतर है, जो समाज उन्हें अलग रूप में परिभाषित करता हैभारत में तो बाल श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा खतरनाक कार्यों में भी लिप्त हैइन बच्चों को कुछ पैसा देकर इनके मालिक इनसे जरूरत से ज्यादा कार्य करवाते हैंकम पैसे में ये बच्चे अधिक कार्य करते हैं तथा अन्याय के खिलाफ आवाज भी नहीं उठाते यही कारण है कि इन कारखानों के मालिक बच्चों के शोषण का कोई भी अवसर नहीं गंवातेइसी कारण बाल श्रम निषेध व विनिमयन कानून जो यह कहता है कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को वे कार्य जो उनके जीवन और स्वास्थ्य के लिए अहितकर हों न दिए जाएं, कागज पर ही प्रभावी दिखाई देता हैइस कानून कि सार्थकता तभी पूर्ण होगी जब कारखानों, ईंट केभट्टों पर तथा घरेलू नौकर के रूप में बंधुआ मजदूर बने बच्चों को विषम परिस्थितियों से निकाल कर उन्हें एक सहज व स्वस्थ बचपन लौटाया जा सकेआप किसी होटल खाना जाएं या चाये की दुकान पर चाये पीने जाए, तभी अगर कोई छोटू आपको भोजन परोसे या चाय दे तब विरोध की प्रबल आवाजें उठेगी, उन्हें मुक्त करने का प्रयास होगा, तभी बाल मजदूर मुक्त भारत का सपना तभी साकार हो पाएगा

यह लेख इतिश्री सिंह राठौर जी द्वारा लिखी गयी है . वर्तमान में आप हिंदी दैनिक नवभारत के साथ जुड़ी हुई हैं. दैनिक हिंदी देशबंधु के लिए कईं लेख लिखे , इसके अलावा इतिश्री जी ने 50 भारतीय प्रख्यात व्यंग्य चित्रकर के तहत 50 कार्टूनिस्टों जीवनी पर लिखे लेखों का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद किया. इतिश्री अमीर खुसरों तथा मंटों की रचनाओं के काफी प्रभावित हैं.

श्रेयस् / महेंद्रभटनागर


सृष्टि में वरेण्य
एक-मात्र
स्नेह-प्यार भावना!
महेंद्र भटनागर
मनुष्य की
मनुष्य-लोक मध्य,
सर्व जन-सृष्टि मध्य
राग-प्रीति भावना!

समस्त जीव-जन्तु मध्य
अशेष हो
मनुष्य की दयालुता!
यही
महान श्रेष्ठतम उपासना!

विश्व में
हरेक व्यक्ति
रात-दिन / सतत
यही करे
पवित्र प्रकर्ष साधना!

व्यक्ति-व्यक्ति में जगे
यही
सरल-तरल अबोध निष्कपट
एकनिष्ठ चाहना!
*



महेंद्र भटनागर स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी-कविता के बहुचर्चित यशस्वी हस्ताक्षर हैं।महेंद्रभटनागर-साहित्य के छह खंड 'महेंद्रभटनागर-समग्र' अभिधान से प्रकाशित हो चुके हैं।महेंद्रभटनागर की कविता-गंगा के तीन खंडों में उनकी अठारह काव्य-कृतियाँ समाविष्ट हैं। महेंद्रभटनागर की कविताओं के अंग्रेज़ी में ग्यारह संग्रह उपलब्ध हैं। फ्रेंच में एक-सौ-आठ कविताओं का संकलन प्रकाशित हो चुका है। तमिल में दो, तेलुगु में एक, कन्नड़ में एक, मराठी में एक कविता-संग्रह छपे हैं। बाँगला, मणिपुरी, ओड़िया, उर्दू, आदि भाषाओं के काव्य-संकलन प्रकाशनाधीन हैं।

DR. MAHENDRA BHATNAGAR
Retd. Professor


110, BalwantNagar, Gandhi Road,
GWALIOR — 474 002 [M.P.] INDIA
Ph. 0751- 4092908
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