चीना/बाल कहानियां

कालीन 

बुनकर जाति की तुलसी नाम की एक औरत शहर के पास एक गाँव में झोपड़ी बनाकर रहती थी। उसकी एक प्यारी-सी चीना नाम की बिटिया थी। तुलसी खूब सुन्दर कालीन बुनती थी और उसे शहर में ले जाकर बेच आती थी। उसकी झोपड़ी के सामने हरे-भरे फलदार पेड़ लगे थे और छोटी-सी एक बगिया थी। हर सुबह-शाम कई रंग-बिरंगी चिड़ियाँ उस बगिया में आती और खेला करती थीं। जिस दिन उसकी कालीन बिक जाती उस दिन तुलसी चिड़ियों के लिये चाँवल के दाने शहर से खरीद लाती और उन्हें चुगने के लिये देती। धीरे-धीरे तुलसी और चिड़ियों में दोस्ती हो गई। चीना भी चिड़ियों के साथ खेला करती थी।
होते होते तुलसी बूढ़ी और कमजोर हो गई। उसके लिये कालीन शहर में ले जाकर बेचना बहुत मुश्किल काम हो गया। तब चिड़ियों ने कहा, ‘अम्मा! आप कालीन बुनकर हमें दे दिया करो। हम सब मिलकर उसे शहर में ले जाकर बेच दिया करेंगे।’ तुलसी मान गई और कालीन बुनकर झोपड़ी के बाहर फैलाकर रख देती। चिड़िया भुर्र से उड़कर आती और चारों कोने से कालीन पकड़कर उड़ती हुई शहर में ले जातीं। कालीन बिक जाने पर हर इक चिड़िया अपनी चोंच में पैसे दबाकर उड़ती हुई वापस झोपड़ी में आती और तुलसी को दे देतीं।
कुछ समय बाद तुलसी इतनी कमजोर हो गई कि कालीन बुनना उसके लिये कठीन हो गया। तुलसी बिस्तर से लग गई थी। चिड़ियाँ अब खेत से अनाज के दाने चुनकर लाकर झोपड़ी के सामने जमा कर देती ताकि तुलसी और चीना भूखी न रह पावें। एक दिन चीना ने अपनी माँ से कहा, ‘माँ! चिड़ियाँ रोज इतनी मेहनत करती हैं और अपन यूँ ही बैठे रहते हैं। यह मुझे अच्छा नहीं लगता। आप मुझे कालीन बनना सिखा दो। मैं उसे लेकर शहर में बेच आऊँगी।’
चीना ने कालीन बनना कुछ-कुछ सीख लिया परन्तु वह अपनी माँ के समान सुन्दर कालीन नहीं बना सकती थी। फिर भी उसने एक कालीन बनाया और उसे लेकर बेचने शहर गई। लेकिन उसका कालीन किसी ने भी नहीं खरीदा। शाम को बेचारी चीना रोती-रोती वापस आ गई।
उसको रोता देख चिड़ियों ने कारण पूछा, तो चीना ने रोते-रोते सारी बात उन्हें बतायी। चिड़ियों ने कहा, ‘हमे बतावो कि तुमने कैसी कालीन बनाई है।’ चीना ने कालीन झोपड़ी के बाहर फैलाकर रख दी। चिड़ियों ने कहा, ‘इसे यहीं बिछे रहने दो। हम सब मिलकर कुछ करेंगे ताकि कालीन बिकने लायक हो जावे।’ और रात भर सारी चिड़ियों ने अपने रंग-बिरंगी पंखों को बुनाई करे धागे में खोंसकर सुन्दर बनाने की कोशिश की।
भूपेंद्र कुमार दवे
सुबह तक कालीन बन चुकी थी। चीना ने देखा कि कालीन पर अद्भुत बगीचा बना था, जिसमें अनेक सुन्दर फूल की क्यारियाँ बनी थी। कई तरह की चिड़ियाँ उस बगीचे में उकेरी गईं थी। चीना बड़ी खुश हुई और अपनी माँ को जाकर बताया। माँ से आशीर्वाद लेकर वह उस कालीन को शहर में बेचने ले गई। वह कालीन इतनी सुन्दर थी कि उसको देखने भीड़ जमा हो गई। सब लोगों ने सोचा कि इतनी सुन्दर कालीन बहुत मँहगी होगी और इसलिये उसे खरीदने कोई भी आगे नहीं बढ़ा। बेचारी चीना उदास बैठी रही।
शाम होते होते राजा की सवारी उधर से गुजरी। भीड़ देखकर राजा अपने घोड़े पर से उतरा और जब पास आकर उसने कालीन देखी तो मंत्रमुग्ध हो उसे देखने लगा। राजा ने अपने मंत्री से कहा, ‘इस कालीन को एक हजार मुद्रा में खरीद लो। यह अपने सभाकक्ष की शोभा बढ़ायेगी।’
मंत्री ने कहा, ‘हजूर! अभी तो इतनी मुद्रायें पास में नहीं हैं।’
‘कोई बात नहीं,’ राजा ने कहा, ‘इस कालीन को ले चलो और उस लड़की से कहो कि कल वह तुम्हारे पास आकर एक हजार मुद्रायें ले जावे।’
चीना ने कभी सोचा नहीं था कि उसकी कालीन इतनी ऊँची कीमत में बिक जावेगी। उसने खुशी-खुशी वह कालीन राजा को दे दी।
लेकिन जब दूसरे दिन चीना राजा से मिलने गई तो मंत्री ने देख लिया और अलग ले जाकर कहा, ‘काहे की एक हजार मुद्रा माँग रही हो? वह कालीन तो एकदम बेकार थी। रात में ही उसकी सारी चिड़ियाँ उड़ गई और फूल भी मुरझाकर बिखर गये। तुम चुपचाप वापस चली जावो, वरना राजा को मालूम हुआ तो वह तुम्हें कड़ी सजा देगा।’
बेचारी चीना मुँह लटकाये वापस आ गई। चिड़ियों को जब ये बात मालूम हुई तो उन्होंने कहा, ‘चीना रानी उदास मत हो। तुम अपना बनाया एक और कालीन झोपड़ी के बाहर बिछा दो। हम सब मिलकर आज रात उस कालीन को सुन्दर बना देंगे। उसे तुम कल ले जाकर शहर में बेच आना।’
चीना ने दूसरे दिन देखा कि चिड़ियों ने अपने पंखों से कालीन पर घने जंगल में ऊँचे-ऊँचे पेड़ों के बीच एक खूँखार शेर बना दिया था। चीना उसे लेकर शहर गई। उस सुन्दर कालीन को देखने पहले से भी ज्यादा भीड़ जमा हो गई। उस दिन पुनः राजा वहाँ आ गया। वह वास्तव में यह देखने आया था कि अब कौनसी कालीन बजार में आनेवाली थी। जब उसने कालीन देखी तो उसे भी खरीदने के लिये लालायित हो उठा। परन्तु चीना ने कहा, ‘हे राजा! यह कालीन मैं आपको नहीं दे सकती, क्योंकि इस कालीन से आपकी जान को खतरा है।’
‘ए प्यारी बच्ची! तुम ये क्या कह रही हो?’ राजा ने कहा, ‘भला इस कालीन से मुझे क्या खतरा है?’
चीना ने कहा, ‘हे राजन्! कल जो कालीन आप ले गये थे उसपर बनी सारी चिड़ियाँ जीवित हो गई और रात में उड़ गई थीं और सारे फूल भी मुरझा गये थे। आप चाहें तो मंत्री से पूछ सकते हैं कि यह बात सच है या नहीं। इस कालीन में शेर बना है। वह रात में चिड़ियों की तरह उड़ेगा तो नहीं पर हो सकता है कि वह आप पर ही हमला कर आपको मार डाले। मैं यह कालीन आपको नहीं दे सकती क्योंकि आप सबके प्यारे राजा हैं।’
राजा ने जब मंत्री की तरफ देखा तो वह डर के मारे थर-थर काँप रहा था। राजा ने सचाई भाँप ली और कहा, ‘दिखता है कि कल तुम्हें झाँसा देकर एक हजार मुद्रायें नहीं दी गईं हैं। मैं कल और आज के कालीन के दस हजार मुद्रायें दूँगा और मंत्री को उसके पद से अलग भी कर दूँगा। तुम कल मुझसे ही आकर मिलना।’
चीना ने कहा, ‘राजन्! मुझे आप दो हजार मुद्रायें ही दें। शेष आठ हजार मुद्राओं की जगह मेरी एक इच्छा की पूर्ति करे दें, यही विनंती है।’
‘बोलो तुम्हारी क्या इच्छा है?’ राजा ने पूछा।
तो चीना ने कहा, ‘आप मंत्री को क्षमा कर दें। इस क्षमादान को पाकर मंत्री कभी ऐसी गलती नहीं करेंगे क्योंकि क्षमादान में ईश्वरीय शक्ति होती है। यह शक्ति अगर राजा के पास आ जावे तो वह उसे श्रेष्ठ बना देती है।’
राजा ने चीना की बात मान ली और जब दूसरे दिन चीना राजमहल पहुँची तो उसने देखा की चारों ओर अद्भुत सजावट की गई थी। उसका स्वागत करने सारे दरबारी द्वार पर आये और ‘रानी की जय’ से सारा वातावरण गूँज उठा।

यह रचना भूपेंद्र कुमार दवे जी द्वारा लिखी गयी है. आप मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल से सम्बद्ध रहे हैं . आपकी कुछ कहानियाँ व कवितायें आकाशवाणी से भी प्रसारित हो चुकी है . 'बंद दरवाजे और अन्य कहानियाँ' ,'बूंद- बूंद  आँसू' आदि आपकी प्रकाशित कृतियाँ है .
»»  आगे पढ़ें ...

सच कड़वा होता है/विचार मंथन

मनोज सिंह
आमिर खान एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार भी उन्होंने हैरान किया है। 'लगान', 'तारे जमीं पर', 'पीपली लाइव' और अब 'सत्यमेव जयते'। हर बार की तरह उन्होंने पुनः प्रदर्शित किया कि अश्लीलता और सनसनी को बेचने की आपाधापी के बीच सामाजिक सरोकार के विषयों के माध्यम से भी लोकप्रिय हुआ जा सकता है। और हम सोचने के लिए मजबूर हुए हैं। यह सदा एक बड़ा प्रश्नचिन्ह बनकर बाजार के ठेकेदारों को हैरान-परेशान करता होगा। इल्जाम लगाने वालों से प्रश्न किया जाना चाहिए कि अगर सामाजिक मुद्दों को बेचने की कला में आमिर और उसके साथी सफल हैं तो इसे दूसरों के द्वारा भी क्यों नहीं हथिया लिया जाता? एक फिल्म के सफल हो जाने पर जिस देश में उसी कहानी पर सैकड़ों फिल्में बन सकती हों, जहां जुड़वा भाई फिल्मों में बिछुड़कर और फिर नाटकीय ढंग से मिलकर दसियों साल तक बॉक्स ऑफिस पर पैसा लूट रहे हों, यही नहीं जहां पुरानी सफलतम फिल्मों की रिमेक तक बनाकर करोड़ों कमा लिये जाते हों, ऐसी अजीबोगरीब दुनिया में इस मुद्दे को लपकने से कौन रोक सकता है? यहां सबसे बड़ी बात कि मनोरंजन और हास्य के नाम पर आज की फूहड़ता, नग्नता, बेहूदगी, व्यंग्य और मजाक की आड़ में द्विअर्थी संवाद और इन सबके केंद्र में कामुकता की चमक और शोर-गुल में आमिर की सौम्यता, शालीनता, सौहार्दपूर्ण व्यवहार, गंभीरता और परिपक्वता आकर्षित करती है। वे इस मामले में किंवदंती माने जाने चाहिए कि जिस समाज में बच्चा मां-बाप की नहीं सुनता, शिष्य गुरु और युवा बुजुर्गों के अनुभवों से सीख नहीं लेना चाहता हो, उलटे उन्हें तिरस्कृत करता हो, वहां उन्हें सुनने के लिए लोग तैयार ही नहीं, उत्सुकतापूर्ण इंतजार भी कर रहे हैं, यह क्या कम है!! कहने वाले कह सकते हैं कि इस तरह की बातें, इन विषयों पर बोलने वाले सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक एवं अन्य लोगों की कमी नहीं, मगर प्रचार-प्रसार की कमी की वजह से उन्हें कोई सुनता नहीं। और आमिर खान के सितारा होने के कारण ही वे सुने जाते हैं। मगर फिर इस तथ्य को भी नहीं ठुकराया जा सकता कि आमिर को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने, सितारा बनाने में, उनकी इन्हीं भूमिकाओं का बहुत बड़ा योगदान रहा है। और फिर यहां सवाल पूछने की जगह खुश होना चाहिए, चूंकि सितारों से सामाजिक सरोकार से जुड़ने की अपेक्षा सदा की जाती रही है। वरना ऐसे उदाहरण हिन्दी फिल्म जगत से लेकर खेल और अन्य प्रसिद्धी के क्षेत्रों में कहां दिखाई देते हैं? उलटा हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि लोकप्रियता भुनाने के लिए बाजार सितारों को रोज बेचता है ओर ये रोज खुशी-खुशी बिकते हैं। और दिनभर तेल-साबुन-पेंट से लेकर हर कुछ बेचते देखे जा सकते हैं। विज्ञापनों से समाज पर क्या असर हो सकता है, इससे इन्हें कोई मतलब नहीं होता, उलटा ये बड़ी चतुराई से हमारे आदर्श भी बना दिये जाते हैं। ये अपने स्वार्थवश व्यापार और राजनीति में भी गठजोड़ और घुसपैठ कर सकते हैं मगर अपने प्रशंसकों के हित के लिए कुछ भी करते नहीं देखे जा सकते। हां, यहां कुछ हद तक अमिताभ बच्चन का नाम लिया जा सकता है। जिन्होंने 'कौन बनेगा करोड़पति' के माध्यम से, सभ्यता एवं संस्कृति के दायरे में रहते हुए, रोचक ढंग से ज्ञान को विस्तार देने का कार्य किया है। उन्होंने गाहे-बगाहे साहित्य में भी रुचि दिखाई है। वरना चारों ओर अन्य सभी भांति-भांति से सिर्फ लूटते नजर आते हैं। यहां आलोचकों के लिए आमिर खान भी सामाजिक मुद्दों को बेचकर करोड़ों कमाते नजर आ सकते हैं, मगर फिर वे अपनी जमीर व इंसानियत को बनाये हुए हैं और धंधे के नाम पर कुछ भी करने और बेचने को तत्पर दिखायी नहीं देते। कम से कम उनके उद्देश्य पर यहां प्रश्नचिन्ह तो नहीं लगाया जा सकता। आज के दौर में कोई पैसा लेकर भी सकारात्मक बना रहे तो बड़ी बात है।
आमिर खान ने शुरुआती एपिसोड से ही दर्शकों में अपनी पैठ बना ली है। रविवार को छुट्टी वाले सुस्ती के दिन भी इस कार्यक्रम ने लोगों में उत्सुकता पैदा की है। अचानक बंद हो चुके धारावाहिक 'चंद्रगुप्त' के दर्शकों के लिए यह एक अच्छे विकल्प के रूप में प्रस्तुत हुआ है जो अपने मनपसंद ऐतिहासिक कार्यक्रम के बिना निरुद्देश्य समय गुजारा करते थे। अगले हफ्ते कौन-सा मुद्दा आमिर उठायेंगे इस बात की उत्सुकता रहती है। यहां मुझे 'सत्यमेव जयते' शीर्षक से आपत्ति तो नहीं मगर इस संदर्भ में कुछेक प्रश्न अनायास ही मन में उठ रहे हैं। यहां इस आरोप को मैं उचित नहीं मानता कि 'सत्यमेव जयते' शब्द की लोकप्रियता का लाभ उठाने का प्रयास किया गया है। ऐतिहासिक लोकोक्तियां, मुहावरे आदि पर किसी का एकाधिकार नहीं है और इसे अपने-अपने तरीके से उपयोग करने से नहीं रोका जा सकता। मगर मैं यहां कार्यक्रम के भावार्थ से संदर्भित हूं। 'सत्यमेव जयते' का सीधे-सीधे अर्थ है सत्य की जीत। मगर आमिर तो अपने कार्यक्रम में समाज के उस सच को बता रहे हैं जो नंगा एवं कड़वा है। जिसकी हम जीत नहीं चाहते। बल्कि उस पर अपनी जीत और नियंत्रण चाहते हैं। बहरहाल, यहां इसे समाज को सही दिशा की ओर प्रोत्साहित करने के लिए प्रेरणादायक कथन के रूप में लिया जा सकता है।
हमेशा की तरह सामाजिक-यंत्र-जालों एवं पत्र-पत्रिकाओं में इस पर चर्चा और आलोचना शुरू हो चुकी है। खुशी इस बात की है कि शुरुआती आलोचना, वो भी उन कुछ एक तथाकथित लोगों के द्वारा, जिन्हें हर मुद्दे पर रोते-पीटते-चिल्लाते देखा जा सकता है, के अतिरिक्त कुछ विशेष नकारात्मक टिप्पणी नहीं मिली। शुक्र है कि इस अच्छे-खासे सीधे-सरल कार्यक्रम को सामाजिक एवं पारिवारिक मुद्दों से जुड़े कुछ भौंडे और गाली-गलौज से भरे अन्य धारवाहिकों से तुलना करने की बातें भी आगे नहीं बढ़ पायीं। आमिर द्वारा उठाये गये मुद्दों ने मुझे आकर्षित किया है। यूं तो अभी तक लिये गये दोनों विषयों पर आमिर खान ने सीधे-सीधे बहुत कुछ कहने की कोशिश की लेकिन न जाने क्यों संपूर्णता का आभास नहीं हुआ। कहीं कुछ छूट रहा है ऐसा प्रतीत होता है। फिर मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान से ऐसी उम्मीद तो की ही जा सकती है। कन्या भ्रूण-हत्या के मामले में आमिर खान स्पष्ट रूप से यह बताने से क्यों और कैसे चूक गये कि इसके लिए बहुत हद तक स्वयं नारी, फिर चाहे वो जिस रूप में हो, जिम्मेवार है। फिर दिखाये गये पात्र की जीवन-कहानी में एक पक्ष को सुनकर निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं। वो भी तब जब मुद्दे न्यायालय में लंबित हों। बहरहाल, इस चर्चा में बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या के नियंत्रण के मुद्दे को पूरी तरह अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। हां, भ्रूण को गर्भ में सिर्फ नर या नारी होने के कारण गिरा देना कदापि उचित नहीं। लेकिन इस बढ़ती अनियंत्रित भीड़ के बीच एक भूखे अभावग्रस्त जीव को दुनिया में लाना क्या उचित होगा? वो भी उस समाज में जहां नर-नारी के मिलन को सदैव जनन से जोड़कर रखा गया हो। ऊपर से जिस मुद्दे पर धर्म भी बेहद खतरनाक रोल में उपस्थित हो। ऐसे में भविष्य की भयावह तस्वीर उभकर आती है। दूसरे कार्यक्रम के संदर्भ में बात करें तो बाल यौन-शोषण पर गंभीर चर्चा करने के दौरान हम यह भूल जाते हैं कि ऐसा करके कहीं हम अपने प्राकृतिक सामान्य व्यवहार को संशयित व भ्रमित तो नहीं कर रहे? बहुत अधिक ज्ञान के साथ अति सतर्कतापूर्ण जीवन सब कुछ नीरस कर देता है। जबकि सत्य यह है कि बच्चे सदैव आमजन को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। उनके साथ खेलना, बातें करना, उन्हें लाड़-दुलार करना हर दूसरे सामान्य व संवेदनशील व्यक्ति को पसंद है। अब ऐसा करने पर हर एक को जाने-अनजाने ही सतर्क होना पड़ेगा। कोई गलत सोच सकता है, ऐसे विचार मन में अनायास ही आ सकते हैं। मां-बाप बच्चों से प्यार करने वाले हर बुजुर्ग को शक की निगाह से देख सकते हैं। इस चक्कर में मासूम बच्चे कई रिश्तों के निश्छल प्यार से वंचित हो सकते हैं। आज की पीढ़ी कृत्रिम एवं प्राकृतिक के बीच की महीन अंतर को समझ नहीं पाती, उलटे शब्दों को अक्षरशः पालन करने के चक्कर में जीवन-मूल्यों को नष्ट कर देती है। इससे सामान्य धड़कनें भी मशीनजनित उत्पन्न होती प्रतीत होती है। हम किसी एक अनिष्ट की आशंका में अपना तमाम जीवन संशय और भय में बीता ले जाते हैं। हमें याद रखना होगा ये समस्याएं समाज में आदिकाल से हैं। हर युग ने अपने-अपने समय में इनका अपने-अपने ढंग से सामना किया है। हमें भी अपने समय की युक्तियों को ढूंढ़ना होगा। मगर बहुत अधिक समझ-बूझकर। अब जबकि आमिर खान पथ-प्रदर्शक के रूप में प्रस्तुत हो रहे हैं तो उन्हें अपने विचारों को व्यापक एवं बृहद् दृष्टिकोण प्रदान करना होगा। यहां और अधिक सतर्कता की आवश्यकता है। छोटी-सी चूक भी भ्रम पैदा कर सकती है। उदाहरणार्थ गलत चरित्रों का चयन कई प्रश्न खड़े कर सकता है। जैसा कि पिछले कार्यक्रम में उपस्थित एक व्यक्ति का किसी दूसरे कार्यक्रम में भिन्न संदर्भ में उपस्थित होना बुद्धिजीवियों के बीच चर्चा का विषय है।
आमिर आम जनता को कड़वे सच का सामना कराने के साथ-साथ अपने साथी सितारों को भी सीख देने का काम कर रहे हैं, जो मनोरंजन को पूरी तरीके से व्यावसायिक बना चुके हैं और अपनी लोकप्रियता को स्वार्थसिद्धि के लिए किसी भी हद तक उपयोग करने लिए तैयार हैं। इसमें कोई शक नहीं कि आमिर ने स्वयं को भविष्य के पन्नों में भी दर्ज कर लिया है और वे काफी समय तक याद किये जायेंगे। वरना लोकप्रियता के शिखर पर बैठे सातवें आसमान के सितारों को अपना हश्र एक ही जीवन में इसी जमीन पर गिरकर देखने को मिल जाता है। आज कई ऐसे बड़े सुपर-स्टार हिंदी जगत में जीवित हैं, जिनके लिए आज की पीढ़ी के पास वक्त नहीं। अगर उन्होंने भी अपने स्वर्णिम काल में कुछ सामाजिक पुण्य बटोरे होते तो वे पलटकर अब सामने आते। 
 
यह लेख मनोज सिंह द्वारा लिखा गया है.आप ,कवि ,कहानीकार ,उपन्यासकार एवं स्तंभकार के रूप में प्रसिद्ध है .आपकी 'चंद्रिकोत्त्सव ,बंधन ,कशमकश और 'व्यक्तित्व का प्रभावआदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है .
 
»»  आगे पढ़ें ...

अभी न होगा मेरा अन्त/ निराला

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला 
अभी न होगा मेरा अन्त
अभी-अभी ही तो आया है
मेरे वन में मृदुल वसन्त-
अभी न होगा मेरा अन्त

हरे-हरे ये पात,
डालियाँ, कलियाँ कोमल गात!

मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर
फेरूँगा निद्रित कलियों पर
जगा एक प्रत्यूष मनोहर

पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लूँगा मैं,
अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं,

द्वार दिखा दूँगा फिर उनको
है मेरे वे जहाँ अनन्त-
अभी न होगा मेरा अन्त।

मेरे जीवन का यह है जब प्रथम चरण,
इसमें कहाँ मृत्यु?
है जीवन ही जीवन
अभी पड़ा है आगे सारा यौवन
स्वर्ण-किरण कल्लोलों पर बहता रे, बालक-मन,

मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बन्धु, दिगन्त;
अभी न होगा मेरा अन्त।



सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला " ने अपना जीवन परिचय एक पंक्ति में देते हुए लिखा है ,"दुःख ही जीवन की कथा रही"। सच में निराला का जीवन दुखों से भरा था और उन दुखों को चुनौती देने ,उनसे जूझने और उन्हें परास्त करने में ही उनका निरालापन था।
»»  आगे पढ़ें ...

यशपाल के चित्र

प्रिय मित्रों , हिन्दीकुंज में हिन्दी साहित्यकारों की चित्र श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है . आज इस कड़ी में प्रस्तुत है - 'यशपाल के चित्र' . आधुनिक हिन्दी साहित्यकारों में यशपाल का नाम प्रमुख है . प्रेमचंद के बाद जिन साहित्यकारों ने जनवादी चेतना को प्रखर दृष्टि दी ,उनमें यशपाल अग्रणी है. ये एक ही साथ क्रांतिकारी व साहित्यकार दोनों रूपों में जाने जाते है . 
आशा है कि आप सभी को यह चित्र पसंद आयेंगे . 
धन्यवाद. 












आप इन चित्रों को यहाँ से डाउनलोड करें 


सौजन्य : विप्लव.कॉम 
»»  आगे पढ़ें ...

चप्पल (२)/ कमलेश्वर

कमलेश्वर 
गतांक  से आगे ...
वार्ड बॉय बच्चे की कुर्सी को पुश करता हुआ ऑपरेशन थिएटर वाले बरामदे में मुड गया नर्स उसके साथ ही चली गयी उसका बाप धीरे-धरे उन्हीं के पीछे चला गया .
तब मुझे याद आया कि मुझे तो सातवीं मंज़िल पर जाना था संध्या वहीं थी मैं सीढ़ियों से एक मंज़िल उतर आया संध्या के डॉक्टर पति ने मुझे पहचाना और आगे बढ़कर मुझसे हाथ मिलाया हाथ की पकड में मायूसी और लाचारी थी क़ुछ पल खामोशी रही फ़िर मैंने कहा , मैं कल ही वापस आया तभी पता चला यह एकाएक कैसे हो गया ?
-- नहीं, एकाएक नहीं, ब्लीडिंग तो पहले भी हुई थी पर तब कंट्रोल कर ली गयी थी पंद्रह दिनों बाद फिर होने लगी एक्सेसिच ब्लीडिंग चार घंटे ऑपरेशन में लगे एंड यू नो, वी डॉक्टर्स आर वर्स्ट पेशेंट्स! वो संध्या के बारे में भी कह रहे थे संध्या भी डॉक्टर थी .
-- यस! आप तो सब समझ रहे होंगे संध्या को भी एक -एक बात का अंदाज़ हो रहा होगा ! मैंने कहा .
-- लेकिन वो बहुत करेजसली बिहेव कर रही है ! संध्या के डॉक्टर पति ने कहा , बोल तो सकती नहीं पल्स भी गर्दन के पास मिली अर्टीफ़िशियल रेस्परेशन पर है एक तरह से देखिए तो उसका सारा शरीर आराम कर रहा है और सब कुछ आर्टीफ़िशिल मदद से ही चल रहा है , संध्या के डाक्टर पति ज्यादातर बातें मुझे मेंडिकल टर्म्स में ही बताते रहे और मैं उन्हें समझने की कोशिश करता रहा बीच -बीच मैं इधर-उधर की बातें भी करता रहा .
संध्या का  भी आज सुबह पहुंच गया क़िसी तरह उसे जापान होते हुए टिकट मिल गया ! उन्होंने बताया .
यह बहुत अच्छा हुआ मैंने कहा .
आप देखना चाहेंगे ?
हां, अगर पॉसिबिल हो तो ...
आइए देख तो सकते हैं भीतर जाने की इजाज़त नहीं है वैसे तो सब डॉक्टर फ्रेंड्स ही हैं, पर ...
नहीं-नहीं, वो ठीक भी है ...
वो बोल भी नहीं सकती वैसे आज कांशस है क़ुछ कहना होता है तो लिख के बता देती है उन्होंने कहा और एक केबिन के सामने पहुंचकर इशारा किया .
मैंने शीशे की दीवार से संध्या को देखा वह पहचान में ही नहीं आयी दो डॉक्टर और नर्स उसे अटैंड भी कर रहे थे और फिर इतनी नलियां और मशीनें थीं कि उनके बीच संध्या को पहचानना मुश्किल भी था.
संध्या होश में थी ड़ॉक्टर को देख रही थी ड़ॉक्टर उसका एक हाथ सहलाते हुए उसे कुछ बता रहा था मैंने संध्या को इस हाल में देखा तो मन उदास हो गया वह कितनी लाचार थी बीमारी और समय के सामने आदमी लाचार होता है क़ुछ कर नहीं पाता मैंने मन ही मन संध्या के लिए प्रार्थना की , किससे की यह नहीं मालूम -ऐसी जगहों पर आकर भगवान पर ध्यान जाता भी है और किसी के शुभ के लिए उसके अस्तित्व को स्वीकार कर लेने में अपना कुछ नहीं जाता -सिवा प्रार्थना के कुछ शब्दों के .
हम आई सीयू से हटकर फिर बरामदे में आ गये वहां बैठने के लिए कोई जगह नहीं थी बरामदे बैठने के लिए बनाये भी नहीं गये थे संध्या या डॉक्टर की बहन नीचे चाद बिछाये बैठी थी ड़ॉक्टर के कुछ दोस्त एक गुच्छे में खड़े थे
अभी तो, बाद में, एक ऑपरेशन और होगा संध्या के डॉक्टर पति ने बताया, तब छोटी आंत को सिस्टम से जोड़ा जायेगा ख़ैर पहले वो स्टेबलाइज़ करे, फिर रिकवरी का सवाल है उसके बाद मैं सोचता हूं - उसे अमेरिका ले जाऊंगा !
यह ठीक रहेगा!
इसके बाद हम फिर इधर-उधर की बातें करते रहे मैं संध्या की संगीन हालत से उनका ध्यान भी हटाना चाहता था इसके सिवा मैं और कर भी क्या सकता था , और डॉक्टर के सामने यों खामोश खड़े रहना अच्छा भी नहीं लग रहा था, यह जताते हुए कि अस्पताल वालों से छुपाकर मैं सिगरेट पीना चाहता हूं - मैं खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया बाहर लू चल रही थी नीचे धरातल पर कुछ लोग आ-जा रहे थे वे ऊपर से बहुत लाचार और बेचारे लग रहे थे और मेरे मन से सबके शुभ के लिए सद्भावना की नदियां फूट रही थीं एेसे में तुम सोचो - लगता है मनुष्य ने मनुष्य के साथ तो सघन और उदात्त संबंध बना लिए हैं, पर ईश्वर के साथ वह ऐसा नहीं कर पाया है मनुष्य अपने ईश्वर के दु :ख-सुख में शामिल नहीं हो सकता ईश्वर से उसका सबंध सिर्फ दाता और पाता का है वहदेता है और मनुष्य पाता है क़ितना इकतरफा रिश्ता है यह और फिर अगर तुम यह भी मान लो कि ईश्वर ही मनुष्य को बनाता तो ईश्वर की क्षमता पर विश्वास घटने लगता है - सृष्टि के आदि से वह मनुष्य को बनाता आ रहा है परंतु असंख्य प्राणियों को बनाने के बावजूद वह आज तक एक सहज संपूर्ण और मुकम्मिल मनुष्य नहीं बना पाया क़ुछ कमी कहीं तो ईश्वर की व्यवस्था में भी है हो सकता है उनका आदि -कलाकार कुंभकार उन्हें मिट्टी सप्लाई करने में कुछ घपला कर रहा हो ऌस रहस्य का पता कौन लगायेगा? रहस्य ही रहस्य को जन्म देता है शायद इसीलिए मनुष्य ने ईश्वर को रहस्य ही रहने दिया ज़ो सत्ता या शक्ति विश्वास के निकष पर खरी न उतरे , उसे रहस्य बना देना ही बेहतर है और किया भी क्या जा सकता ...
लू के एक थपेड़े ने मेरा मुँह झुलसा दिया। ड़ॉक्टर अपने चिंताग्रस्त शुभचिंतकों के गुच्छे में खड़े थे- और सबके चेहरे कुछ ज्यादा सतर्क थे।
ब्लडप्रेशर गिर रहा है
आईसीयू में डॉक्टरों और नर्सो की आमदरफ्त से लग रहा था कि कोई कठिन परिस्थिति सामने है क़ुछ देर बाद पता चला कि नीडिल कुछ ढीली हो गयी थी उसे ठीक कर दिया गया है और ब्लडप्रेशर ठीक से रिकॉर्ड हो रहा है सबने राहत की सांस ली मौत से लड़ना कोई मामूली काम नहीं है ईश्वर ने तो मौत पैदा की ही है , पर मौत तो मनुष्य भी पैदा करता है एक तरफ जीवन के लिए लड़ता है ओर दूसरी तरफ मौत भी बांटता है- यह द्वंद्व ही तो जीवन है यह द्वंद्व और द्वैत ही जीवित रहने की शर्त है और अद्वैत या समानता तक पहुंचने का साधन और आदर्श भी आध्यात्मिक अद्वैत जब भौतिकता की सतह पर आता है और मनुष्य के प्रश्न सुलझाता है तभी तो वह समवेत समानता का दर्शन कहलाता है .........
सिगरेट से मुंह कड़वा हो गया था लू वैसे ही थपेड़े मार रही थी सीमेंट के पलस्तर का दहकता-चिलचिलाता तालाब सामने फैला था - कोई एक आदमी जलते नंगे पैरों से उसे पार कर रहा था .
मैंने पलटते हुए लिफ्ट की तरफ देख ड़ॉक्टर मेरा आशय समझ गये थे, लेकिन तभी राजनीतिज्ञ- से उनके कोई दोस्त आ गये थेशुरू की पूछताछ के बाद वे लगभग भाषण-सा देने लगे, अब तो अग्नि मिसाइल के बाद भारत दुनिया का सबसे शक्तिशाली तीसरा देश हो गया है और आने वाले दस वर्षो में हमें अब कोई शक्ति -महाशक्ति बनने से नहीं रोक सकती इंग्लैंड और फ्रांस की पूरी जनसंख्या से ज्यादा बड़ा है आज भारत का मध्यवर्ग अपनी संपन्न्ता में भारतीय मध्यवर्ग जैसी शक्ति और संपन्नता उन देशों के मध्यवर्ग के पास भी नहीं है ........
तभी एक चिंताग्रस्त नर्स तेज़ी से गुजर गयी और सन्नाटा छा गया चिंता के भारी क्षण जब कुछ हल्के हुए तो मैंने फिर लिफ्ट की तरफ देखा ड़ॉक्टर साहब समझ गये, आपको ढाई -तीन घंटे हो गये क्या-क्या काम छोड़ के आये होंगे अौर वे लिफ्ट की ओर बढ़े लिफ्ट आयी , पर वह ऊपर जा रही थीड़ॉक्टर साहब को मेरी खातिर रूकना न पड़े, इसलिए मैं लिफ्टमैं घुस गया .
लिफ्ट आठ पर पहुंचा वहाँ ज्यादा लोग नहीं थे पर एक स्ट्रेचर था और दो -तीन लोग। स्ट्रेचर भीतर आया उसी के साथ लोग भी स्ट्रेचर पर चादर में लिपटा बच्चा पड़ा हुआ था वह बेहोश था वह आपरेशन के बाद लौट रहा था उसके गालों और गर्दन के रेशमी रोएं पसीने से भीगे हुए थे माथे पर बाल भी पसीने के कारण चिपके हुए थे .
उसका बाप एक हाथ में ग्लूकोज की बोतल पकड़े हुए था ग्लूकोज की नली की सुई उसकी थकी और दूधभरी बांह की धमनी में लगी हुयी थी उसका बाप लगातार उसे देख रहा था वह शायद पसीने से माथे पर चिपके उसके बालों को हटाना चाहता था , इसलिए उसने दूसरा हाथ ऊपंर किया, पर उस हाथ में बच्चे की चप्पलें उसकी उंगलियों में उलझी हुई थीं वह छोटी -छोटी नीली हवाई चप्पलें ..........
मैंने बच्चे को देख फ़िर उसके निरीह बाप को.
मेरे मुंह से अनायास निकल हो गया इसका...
इसकी टांग काटी गयी है वार्ड बॉय ने बाप की मुश्किल हल कर दी.
ओह! कुछ हो गया था? मैंने जैसे उसके बाप से ही पूछावे मुझे देखकर चुप रह गये उसके ओठ कुछ बुदबुदाकर थम गये लेकिन वह भी चुप नहीं रह सका एक पल बाद ही बोला, जांघ की हड्डी टूट गयी थी.........
चोट लगी थी ?
नहीं सड़क पार कर रहा था एक गाड़ी ने मार दिया, वह बोला और मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे टक्कर मारने वाली गाड़ी फिर वह वीतराग होकर अपने बेटे को देखने लगा .
पांचवीं मंज़िल पर लिफ्ट रूकी बच्चों का वार्ड इसी मंजिल पर था लिफ्ट में आने वाले कई लोग थे वे सब स्टै्रचर निकाले जाने के इंतज़ार में बेसब्री से रूके हुए थे... वार्ड बॉय ने झटका देकर स्ट्रेचर निकाला तो बच्चा बोरे की तरह हिल उठा, अनायास ही मेरे मुंह से निकल गया, धीरे से ...
ये तो बेहोश है इसे क्या पता ? स्ट्रेचर को बाहर पुश करते हुए वार्ड बॉय ने कहा .
उस बच्चे का बाप खुले दरवाजे से टकराता हुआ बाहर निकला तो एक नर्स ने उसके हाथ की ग्लूकोज की बोतल पकड़ ली.
लिफ्ट के बाहर पहुंचते ही उसके बाप ने उसकी दोनों नीली हवाई चप्पलें वहीं कोने में फेंक दीं फ़िर कुछ सोचकर कि शायद उसका बेटा होश में आते ही चप्पलें मांगेगा, उसने पहले एक चप्पल उठाई......... फ़िर दूसरी भी उठा ली और स्ट्रेचर के पीछे-पीछे वार्ड की तरफ जाने लगा .
मुझे नहीं मालूम कि उसका बेटा जब होश में आयेगा तो क्या मांगेगा- चप्पल मांगेगा या चप्पलों को देखकर अपना पैर मांगेगा ...
बेसब्री से इंतज़ार करते लोग लिफ्ट में आ गये थे। लिफ़्टमैन ने बटन दबाया। दरवाज़ा बंद हुआ। वह लोहे का बंद कमरा नीचे उतरने लगा...
                 समाप्त 
»»  आगे पढ़ें ...

राष्ट्रीय भावना की कमी/विचार मंथन

मनोज सिंह 
भारतीय उपमहाद्वीप, अर्थात विश्व की प्राचीनतम सभ्यता। एक राष्ट्र के रूप में हमारा इतिहास बेशक लंबा रहा हो मगर उसका रूप-स्वरूप सदा बदलता रहा, जो हमारी प्रवृत्तियों और कमजोरियों को बखूबी प्रदर्शित करता है। यही नहीं, हमारे भूतकाल का बड़ा कालखंड गुलामी में बीता। दुनिया की शायद ही कोई मनुष्य प्रजाति रही हो जिसने यहां आकर लूट-खसोट और अधिकार जमाते हुए हम पर शासन न किया हो। और हम विभिन्न विदेशी शासकों के अधीन खुशी-खुशी सालों-साल शासित रहे। कह सकते हैं कि इस दौरान हम गुलाम रहने के आदी बन चुके थे। यह धीरे से कब हमारा स्वभाव बन गया हमें पता ही नहीं चला। हमारी संस्कृति में भी शासकों के रंग घुलते-मिलते चले गये। हमारी अति प्राचीन वर्ण-व्यवस्था एवं जातिप्रथा में भी शासक-शासित की बू आती है। सच पूछा जाये तो अब हम एक ऐसी भीड़ में रूपांतरित हो चुके हैं जो समय-काल में धीरे-धीरे काफी हद तक स्वकेंद्रित व स्वार्थी हो चुकी है। इसका परिणाम यह हुआ कि हम बाहर के व्यक्ति से अपनी आत्मसुरक्षा के नाम पर भी संघर्ष नहीं करते, उलटा उसका स्वागत करते हैं, लेकिन आपस में वर्चस्व की लड़ाई खूब लड़ते हैं। हम अपने ही घर में ताल ठोंकते रहते हैं और एक-दूसरे को देख सीना फूलाने में कसर नहीं छोड़ते। फलस्वरूप हम पर शासन करना बहुत आसान है। हमने अपनी इन कमजोरियों को छिपाने के लिए अनेक शब्दों का आविष्कार किया, कई नई परिभाषाएं रचीं और उनके विशिष्ट अर्थों से स्वयं को अलंकृत किया। सांस्कृतिक, साहित्यिक, धार्मिक-जामा पहनाते हुए दर्शनशास्त्र की नयी-नयी विभिन्न विचारधाराओं से सुशोभित भी कर दिया लेकिन यह हमें किस हद तक नुकसान पहुंचा सकता है, हमें स्वयं नहीं पता। और अगर पता चल भी जाये तो हम अनजान बन जाते हैं। आज यह हमारे अस्तित्व के लिए चुनौती बन चुका है। इसने हमारे अंदर के स्वाभिमान को भी तोड़ा है, मरोड़ा है। हमें कोई एक थप्पड़ मारे तो हम दूसरा थप्पड़ खाने के लिए तैयार रहने की बात तक करते हैं। यह किसी विशिष्ट संदर्भ में तो उचित हो सकता है मगर हमने इसे एक विचारधारा के रूप में पूरे समाज पर थोप देने का प्रयास किया। सच तो यह है कि ऐसा कोई उदाहरण प्रकृति में भी दिखाई नहीं देता। यहां भी अस्तित्व की लड़ाई हर जीवित प्राणी को लड़नी पड़ती है। 
सहअस्तित्व सफल केवल आपसी सामंजस्य से हो सकता है, यह एकतरफा समर्पण से संभव नहीं। कमजोरी से तो कदापि नहीं। समर्पित, हारा हुआ या कमजोर कभी बराबरी नहीं कर सकता। वो अधिकारपूर्वक मांग नहीं कर सकता। उसे मात्र भीख मिल सकती है। उसे दोयम दर्जे का नागरिक कहा जाता है। दया व क्षमा शब्द सामर्थ्यशाली पर ही सुशोभित होते हैं वरना व्यक्ति स्वयं दया का पात्र बनकर रह जाता है। जीवन के इन मूल तथ्यों को हम नजरअंदाज तो कर सकते हैं मगर झुठला नहीं सकते। एक तरफ मानवीय इतिहास हिंसा से भरा हुआ है तो दूसरी तरफ इसे रोकने की तमाम बातें जरूर की जाती हैं, जो कभी पूरी तरह सफल हुई नहीं। क्या किया जाये? मनुष्य के स्वभाव का? यूं तो प्रकृति का संपूर्ण रचना-संसार भी कहीं न कहीं हिंसा पर निर्भर है। मगर सीमाओं में। बात है हिंसा में निहित मायनो, अर्थों व उद्देश्यों को समझने की। कहने को तो मानवीय विकासक्रम में, सामाजिकता के लिए अहिंसक होना आवश्यक है मगर वास्तविकता के धरातल पर यह दिखाई नहीं देता। मानव ने शारीरिक ही नहीं मानसिक हिंसा भी खूब कर रखी है। जो आज भी कई तरह से जारी है। चतुर-चालाक की दुनिया में स्वार्थवश की गयी हिंसा और आत्मसुरक्षा के लिए की गयी हिंसा के बीच लक्ष्मण-रेखा खींचना आसान नहीं। यहां शक्ति के बिना शासन नहीं। और मानव जाति बिना शासन व्यवस्था के समाज की परिकल्पना भी नहीं कर सकती। ऐसी परिस्थितियों के बीच भी हम शासित बने रहने के लिए तत्पर प्रतीत होते हैं। जबकि स्वाभिमान से समझौता कभी भी सराहा नहीं जा सकता। कमजोर हमेशा हंसी का पात्र बनता है। दुनिया में ऐसे लोगों की बहुत कमी है जो हमारे जैसी सोच रखते हैं। साहित्यिक प्रशंसा एवं मात्र वाहवाही के लिए कहने-सुनने और असल जीवन में इसे स्वीकार करके ढालने में फर्क होता है। यह सत्य है कि अति चाहे फिर हिंसा से हो या कायरता की, दुःख देती है। मगर यहां प्रश्न उठता है कि क्या विश्व इतिहास में व्यवस्था के नाम पर शासक की हिंसा को हमेशा जायज नहीं ठहराया गया? समय-समय पर विरोध भी हुये, परिवर्तन भी हुए। मगर क्या नये शासकों को भी हिंसा का सहारा लेना नहीं पड़ा? मगर हम यहां भी भिन्न हैं। यूं तो हमारे ऊपर की गयी ज्यादतियों का विरोध, अंग्रेजी शासनकाल के अतिरिक्त, कहीं पढ़ने-सुनने में भी नहीं आता, ऊपर से जो छिटपुट घटनाएं घटी भी हैं, उन्हें हम इतिहास के पन्नों से गायब करने में अपनी कुशलता का परिचय देने में लगे रहते हैं। हम अपने पुराने क्रूर शासकों के असली रूप को दिखाने में आज भी हिचकिचाते हैं। उलटा धीरे-धीरे उन्हें महिमामंडित करने में प्रयासरत प्रतीत होते हैं। हमारे यहां ऐसे उदाहरण भी कम नहीं जहां सत्‌कर्मी शासक को हमारे ही छल-कपट के कारण सत्ताविहीन होना पड़ा। मजेदारी तो यह देखकर होती है कि हम अपनी इन तमाम ऐतिहासिक असफलताओं को खूबसूरत मोड़ देकर, सीना चौड़ाये खुले में घूमते हैं।
उस समाज का कुछ नहीं हो सकता, जहां बुद्धिजीवी उपरोक्त विचारधारा को पालने में सहायक हों। हद तो तब हो जाती है जब हम दूसरे की दृष्टि से सब कुछ देखते हैं। दूसरों का सम्मान एवं अतिथि-सत्कार किस संस्कृति में नहीं है? लेकिन बाहरी आपके घर में घुसकर मालिक बन जाये यह किसी को स्वीकार्य नहीं। मगर हम इसे भी सहर्ष स्वीकार करते हैं। और फिर इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश भी करते हैं। हमारी मानसिकता में इतनी कमजोरी है कि राष्ट्र-प्रेम और समाज-प्रेम से प्रेरित लोगों को इतना गुमराह कर दिया जाता है कि कई बार तो उन्हें भी अपनी सोच पर भ्रम होने लगता है। अपनी सभ्यता व संस्कृति की बात करना साम्प्रदायिक घोषित कर दिया जाता है जबकि दूसरे की कट्टरता और चालाकी को नजरअंदाज किया जाता है। इस तरह हमने अपने आपको पूरी तरह लाचार और कमजोर बना लिया है। चूंकि दुनिया इतनी सीधी और सरल नहीं है इसलिए इसका भुगतान भी हम करते रहे हैं। बहरहाल, ऐसी सोच अब हमारी आदत में शुमार हो चुकी है। किसी शहर में बड़े से बड़ा हादसा हो जाने के दूसरे दिन शहर की उन्हीं गलियों से भीड़ जब सब कुछ भुलाकर अपने स्वार्थ में पुरानी घटनाओं को रौंदती हुई निकलती है तो हमारे समाचारपत्र, मीडिया, राजनेता, लेखक, जय-जयकार करने लग उठते हैं। कहा जाता है कि देखिये जिंदगी रुकी नहीं। अरे, जिंदगी तो वैसे भी नहीं रुकती! उलटे यह इस बात को दर्शाता है कि हम कितने असंवेदनशील हैं। अपनो की बेवक्त बेवजह मौत पर दो पल आंसू भी नहीं बहाते, चिंता नहीं करते। हमारा समाज के प्रति कोई उत्तरदायित्व नहीं। हमारे साथ कुछ भी हो जाये हमें क्रोध नहीं आता। आक्रोश नहीं पनपता। और अगर आता भी है तो क्षणिक होता है, जो क्रिकेट के खेल की तरह हार-जीत के कुछ समय बाद ही खत्म भी हो जाता है। हम कागजी ही नहीं घर के एक-मिनटी शेर हैं। हमारे शहरों की भीड़ को देखकर कई बार प्रश्न उठता है कि हम किस तरह जीने के लिए पैदा हुए हैं? फिर भी हमें कुछ भी कहने का हक नहीं क्योंकि हमें हर काल में ऐसा न करने के लिए न जाने किस-किस तरह से गुमराह किया गया है। 
हमें विचारधाराओं से, शब्दों से, जीवनशैली से, सोचने की क्षमता से, इस तरह नियंत्रित कर दिया गया है कि हम अपना हित भी नहीं सोच पाते। हम वैचारिक रूप से पूरी तरह खोखले और सांस्कृतिक रूप से पंगु बन चुके हैं। जहां प्रजातंत्र के नाम पर शब्दों के साथ खेलते हुए हम रोज बेवकूफ बनाये जाते हैं, पग-पग प्रताड़ित होते हैं। हमें एक जागरूक और सफल प्रजातंत्र कहा जाता है और जनता की वाहवाही की जाती है। जबकि यह एक कुटिल शब्दों के साथ खेलने के समान है। असल में हमें जो शासक मिलते हैं उसके लिए हम ही जिम्मेवार हैं। उस देश का क्या हो सकता है जिस देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने पांच साल का राजनीतिक अधिकार मात्र चंद नोटों या शराब की बोतल या फिर धर्म-जाति के नाम पर डालकर किसी एक ऐसे व्यक्ति को सौंप देता है जो बाद में हमारा शोषण करना जानता है। उसे इस बात का अहसास नहीं कि अगर वो ढंग से राजनीतिक कर्तव्य का पालन करे तो उसका सामाजिक जीवन सम्मानपूर्वक हो सकता है। मगर उस संस्कृति का क्या किया जाये जो सिर्फ वर्तमान में जीती है। पहले बाहर के लोग हमें बांटकर हमारे ऊपर अपना वर्चस्व बनाये रखते थे अब हमारे अपने ही हमें रोज बांटते रहते हैं और हम समझ नहीं पाते। हमें इतना कमजोर कर दिया गया है कि हमारे सारे नैसर्गिक अधिकारों को पहले छीन लिया जाता है, हमें फटेहाल भूख से तड़पाया जाता है और फिर चंद टुकड़ों को डालकर हम पर दया दिखाई जाती है। और यह अहसास कराया जाता है कि आपके लिए कितना कुछ करने के लिए व्यवस्था आतुर है। मगर इसके लिए कौन दोषी हैं? हम स्वयं। सच तो यह है कि महाभारत में भी पांडवों को आत्मसम्मान और अधिकार के लिए लड़ना पड़ा था, नहीं तो सदियों तक दुर्योधन के अत्याचार को भोगना पड़ता। गुलाम रहना पड़ता। राम को भी रावण से युद्ध करना पड़ा था। राक्षसी प्रवृत्तियां समर्पण की भाषा नहीं जानती। आधुनिक युग में रावण के मायावी रूप में फंसना हमारी कमजोरी ही प्रदर्शित करता है। 
यह लेख मनोज सिंह द्वारा लिखा गया है.मनोजसिंह ,कवि ,कहानीकार ,उपन्यासकार एवं स्तंभकार के रूप में प्रसिद्ध है .आपकी'चंद्रिकोत्त्सव ,बंधन ,कशमकश और 'व्यक्तित्व का प्रभावआदि पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है.

»»  आगे पढ़ें ...

previous